पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व: दसलक्षण धर्म का महत्व

जय जिनेन्द्र!
जैन धर्म में पर्युषण पर्व का विशेष महत्व है, जिसे “पर्वाधिराज” यानी पर्वों का राजा कहा जाता है। यह आत्म-शुद्धि, त्याग और साधना का 10 दिवसीय महापर्व है। यह पर्व जैन श्रावकों (गृहस्थों) और श्राविकाओं के लिए मुनियों की त्याग और तपस्या से भरी जीवन शैली को 10 दिनों तक व्यावहारिक रूप से जीकर देखने का एक सुनहरा अवसर प्रदान करता है। इन दस दिनों में हम दसलक्षण धर्म का पालन करते हैं, जो दस महान गुणों का प्रतीक हैं। यह पर्व हमें बाहरी दिखावे से दूर रहकर, अपने भीतर झांककर अपनी कमियों को दूर करने और एक बेहतर इंसान बनने के लिए प्रेरित करता है।
आइए, इन दसलक्षण धर्मों को विस्तार से जानें:
1. उत्तम क्षमा (Supreme Forgiveness)
यह दसलक्षण धर्मों में पहला और सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है। उत्तम क्षमा का अर्थ केवल दूसरों को माफ़ करना नहीं है, बल्कि अपने भीतर से क्रोध, अहंकार, और द्वेष की भावना को पूरी तरह से मिटा देना है। क्रोध हमारी आत्मा को दूषित करता है और मन की शांति छीन लेता है। क्षमा का पालन करके हम इस आग को बुझाते हैं, और अपनी आत्मा को शुद्ध करते हैं।
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2. उत्तम मार्दव (Supreme Humility)
उत्तम मार्दव, जिसका अर्थ ‘सर्वोत्तम कोमलता’ या ‘विनम्रता’ है, अहंकार, गर्व और अभिमान जैसे विकारों को समाप्त करने का मार्ग है। अहंकार वह विष है जो मनुष्य को भीतर से खोखला कर देता है। विनम्रता वह गुण है जो हमें अपने ज्ञान और उपलब्धियों को दूसरों की सेवा में लगाने के लिए प्रेरित करता है, न कि अपनी बड़ाई का साधन बनाने के लिए।
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3. उत्तम आर्जव (Supreme Straightforwardness)
उत्तम आर्जव का अर्थ है ‘सर्वोत्तम सरलता’ या ‘निष्कपटता’। यह हमें मन, वचन और कर्म की एकता सिखाता है, जहाँ कोई छल-कपट न हो। ‘उत्तम आर्जव कपट मिटावे, दुर्गति त्यागि सुगति उपजावें’ – अर्थात्, यह धर्म अपनाने से मन निष्कपट तथा राग-द्वेष से रहित हो जाता है। यह हमें दिखावे की जिंदगी से दूर रहने की प्रेरणा देता है।
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4. उत्तम शौच (Supreme Purity)
उत्तम शौच का शाब्दिक अर्थ ‘सर्वोत्तम पवित्रता’ है। यह हमें आंतरिक और बाहरी दोनों प्रकार की शुद्धता को अपनाने की प्रेरणा देता है। लोभ, जिसे ‘पापों का बाप’ कहा गया है, आत्मा को सबसे अधिक दूषित करने वाला विकार है। यह धर्म लोभ पर विजय पाकर संतोष और परम शांति की राह दिखाता है।
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5. उत्तम सत्य (Supreme Truthfulness)
उत्तम सत्य का अर्थ ‘सत्यनिष्ठा’ है, जो हमें केवल सच बोलने तक ही सीमित नहीं रखता, बल्कि मन, वचन और कर्म में पूर्ण सत्यता लाने की प्रेरणा देता है। ‘उत्तम सत्य वचन मुख बोले, सो प्राणी संसार न डोले’ – यह बताता है कि सत्य का पालन करने वाले की मुक्ति निश्चित है। यह धर्म हमें निष्पक्षता, विश्वास और सद्भाव का आधार प्रदान करता है।
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6. उत्तम संयम (Supreme Self-control)
उत्तम संयम, जिसका अर्थ ‘सर्वोत्तम आत्म-नियंत्रण’ है, हमें इंद्रियों और मन को वश में रखने की प्रेरणा देता है। ‘उत्तम संयम पाले ज्ञाता, नरभव सफल करे ले साता’ – यह दर्शाता है कि संयमी व्यक्ति का मनुष्य जीवन सार्थक और सफल होता है। संयम का पालन हमें मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करता है।
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7. उत्तम तप (Supreme Austerity)
उत्तम तप, जिसका अर्थ ‘सर्वोत्तम तपस्या’ है, दसलक्षण धर्मों में एक ऐसा सिद्धांत है जो हमें इच्छाओं पर विजय प्राप्त करके आत्म-शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है। तप सिर्फ शरीर को कष्ट देना नहीं है, बल्कि अपनी इंद्रियों, मन और विचारों को अनुशासित करना है। यह हमारी आत्मा को कर्मों के बोझ से मुक्त करने का सबसे शक्तिशाली साधन है।
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8. उत्तम त्याग (Supreme Renunciation)
उत्तम त्याग, जिसका अर्थ ‘सर्वोत्तम त्याग’ है, हमें अपनी इच्छाओं, मोह और ममत्व का त्याग करने की प्रेरणा देता है। त्याग का सीधा अर्थ है ‘परिग्रह की निवृत्ति’ यानी संग्रह करने की प्रवृत्ति को खत्म करना। जब हम बिना किसी रिटर्न की अपेक्षा के अपने पास उपलब्ध संपदा, ज्ञान और समय को दूसरों के उत्थान और कल्याण के लिए लगाते हैं, तो यही सच्चा उत्तम त्याग है।
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9. उत्तम आकिंचन्य (Supreme Non-possessiveness)
उत्तम अकिंचन्य का अर्थ है ‘कुछ भी मेरा नहीं’ का भाव। यह हमें धन-दौलत और सांसारिक वस्तुओं से आसक्ति न रखने की प्रेरणा देता है। यह धर्म हमें यह समझाता है कि हमारी आत्मा ही हमारा असली धन है, और बाकी सब कुछ क्षणिक है। जब हम वस्तुओं से ममत्व छोड़ते हैं, तो हमारा मन शांत और मुक्त होता है।
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10. उत्तम ब्रह्मचर्य (Supreme Chastity)
उत्तम ब्रह्मचर्य का अर्थ ‘सर्वोत्तम आत्म-संयम’ है। यह हमें कामुक विचारों से दूर रहकर अपनी आत्मा को शुद्ध करने की प्रेरणा देता है। ब्रह्मचर्य का पालन हमें मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ बनाता है और हमारी आध्यात्मिक ऊर्जा को बढ़ाता है। यह मोक्ष मार्ग पर चलने के लिए एक आवश्यक सिद्धांत है।
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यह पर्व हमें इन दस गुणों को अपने जीवन में उतारने का अवसर देता है। पर्युषण पर्व सिर्फ धार्मिक क्रियाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन को नैतिक और आध्यात्मिक रूप से समृद्ध बनाने का मार्ग दिखाता है। इन दस दिनों में हम व्रत, उपवास, स्वाध्याय और ध्यान के माध्यम से आत्म-कल्याण के मार्ग पर चलते हैं। इस पर्व का अंतिम दिन “क्षमावाणी” के रूप में मनाया जाता है, जब हम एक-दूसरे से हुई गलतियों के लिए क्षमा मांगते हैं और देते हैं, जिससे मन में कोई भी मैल न रहे।
आइए, हम सब मिलकर इस पर्वाधिराज का पूर्ण लाभ उठाएं और दसलक्षण धर्म को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। सभी को पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।