Uttam Shauch Das Lakshan Dharma Jain Festival Poster HD

जय जिनेन्द्र!

पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व के चौथे दिन, आज, रविवार, 31 अगस्त 2025 को भाद्रपद शुक्ल अष्टमी के पावन अवसर पर हम उत्तम शौच धर्म की आराधना कर रहे हैं। इस दिन को नि:शल्य अष्टमी भी कहा जाता है, जो मन से काँटे (शल्य) निकालने का प्रतीक है। उत्तम शौच, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘सर्वोत्तम पवित्रता’ है, जैन धर्म का एक ऐसा महत्वपूर्ण सिद्धांत है जो हमें आंतरिक और बाहरी दोनों प्रकार की शुद्धता को अपनाने की प्रेरणा देता है।

उत्तम शौच: लोभ पर विजय और संतोष की राह

‘उत्तम शौच लोभ परिहारी, संतोषी गुण रतन भंडारी।’ – यह सूक्ति उत्तम शौच के मूल सिद्धांत को स्पष्ट करती है। लोभ, जिसे जैन दर्शन में ‘पापों का बाप’ कहा गया है, आत्मा को सबसे अधिक दूषित करने वाला विकार है। यह हमें कभी संतुष्ट नहीं होने देता और हमें अनावश्यक वस्तुओं के पीछे भागने के लिए प्रेरित करता है, जिससे मन अशांत और जीवन दुःखमय हो जाता है।

उत्तम शौच धर्म हमें इस लोभ रूपी कषाय को खत्म करने का मार्ग दिखाता है। यह हमें बाहरी पवित्रता (शरीर और वस्तुओं की शुद्धता) के साथ-साथ आंतरिक पवित्रता (मन को लोभ, कपट और लालच से मुक्त करना) पर ध्यान केंद्रित करने को कहता है। जब मन निर्लोभी और संतोषी होता है, तो वह गुणों का भंडार बन जाता है, और व्यक्ति परम शांति का अनुभव करता है।

उत्तम शौच: व्यक्तिगत, सामाजिक और विश्व कल्याण का आधार

उत्तम शौच का पालन केवल आत्म-शुद्धि का साधन नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति, समाज और विश्व के कल्याण का आधार भी है।

  • व्यक्तिगत कल्याण: संतोषी व्यक्ति सुखी होता है। जब हम अपनी आवश्यकताओं को सीमित करते हैं, तो हमारे मन से तनाव और लालच का बोझ हट जाता है। यह हमें जीवन में अधिक प्रसन्न और शांत बनाता है। मानसिक शांति मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए अति आवश्यक है, क्योंकि अशांत मन कभी भी आत्म-ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकता।

  • सामाजिक समरसता: लोभ और लालच ही सामाजिक असमानता, भ्रष्टाचार और संघर्षों का मुख्य कारण हैं। जब समाज के लोग संतोष को अपनाते हैं, तो वे दूसरों का हक नहीं मारते और आपसी सौहार्द बना रहता है। यह सिद्धांत एक ऐसे समाज की नींव रखता है जहाँ हर कोई अपनी मेहनत से संतुष्ट हो और दूसरों का सम्मान करे।

  • विश्व शांति और प्रकृति संरक्षण: विश्वभर में आज जो अशांति और संघर्ष है, उसका एक बड़ा कारण देशों का संसाधनों और सत्ता के प्रति लोभ है। जब राष्ट्र लालच को छोड़कर संतोष को अपनाते हैं, तो युद्ध और शोषण की संभावना कम हो जाती है। यह हमें यह सिखाता है कि पृथ्वी के संसाधन सीमित हैं और उनका न्यायसंगत और विवेकपूर्ण उपयोग होना चाहिए। जब हर व्यक्ति संतोषी होता है, तो वह प्रकृति का अत्यधिक दोहन नहीं करता, जिससे पर्यावरण का संतुलन बना रहता है।

उत्तम शौच की साधना का वैज्ञानिक पहलू

आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि संतोष और कृतज्ञता मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। लोभ और लालच से जुड़ी भावनाएं तनाव और चिंता को बढ़ाती हैं। संतोषी व्यक्ति अधिक स्वस्थ और खुश रहते हैं।

पर्युषण पर्व के चौथे दिन की पूजन विधि और महत्व

आज के दिन की पूजा, स्वाध्याय और जाप विधि हमें उत्तम शौच के सार को समझने में मदद करती है:

  • सिद्ध भगवान पूजन: आज हम सिद्ध भगवान की पूजा करते हैं, जिन्होंने अपनी आत्मा को पूर्ण रूप से शुद्ध कर मोक्ष प्राप्त किया।

  • पुष्पदंत भगवान पूजन: आज पुष्पदंत नाथ भगवान का मोक्ष कल्याणक है। उनकी पूजा हमें पवित्रता और मोक्ष की प्रेरणा देती है।

  • निर्वाण काण्ड: निर्वाण काण्ड का पाठ करके हम उन सिद्धों को नमन करते हैं जिन्होंने लोभ को त्याग कर मोक्ष पाया।

  • देव, शास्त्र, गुरु/पंचपरमेष्ठी/नवदेवता पूजन: उन परम पूज्य गुरुओं की आराधना करें जिन्होंने हमें पवित्रता का मार्ग दिखाया।

  • चौबीसी पूजन (24 तीर्थंकर): तीर्थंकरों ने अपने जीवन में पूर्ण शौच का पालन किया। उनकी पूजा हमें प्रेरणा देती है।

  • मूलनायक तीर्थंकर पूजन: अपनी श्रद्धा को मूलनायक भगवान के चरणों में समर्पित करें।

  • सोलह कारण पूजन: यह हमें आत्मा की शुद्धि और तीर्थंकर पद के लिए आवश्यक गुणों को समझने में मदद करता है।

  • पंचमेरु पूजन: यह पूजा हमें अपनी आत्मा की स्थिरता का स्मरण कराती है।

  • दसलक्षण पूजन: दसलक्षण धर्मों की पूजा करके इन गुणों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें।

  • स्वाध्याय: धर्म ध्यान के लिए स्वाध्याय (शास्त्रों का अध्ययन), विशेष रूप से तत्त्वार्थसूत्र ग्रंथ के सभी 357 सूत्रों का शुद्ध पाठ अवश्य करें और प्रतिदिन एक अध्याय का स्वाध्याय करने से विशेष कर्म निर्जरा होती है, जिससे हमें शौच धर्म को समझने और अपनाने में मदद मिलती है।

  • स्वयंभू स्तोत्र: पूजन की समाप्ति के पहले, समुच्चय महा अर्घ के पहले, स्वयंभू स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन करें। यह मन को एकाग्र करता है।

और अंत में, “ॐ ह्रीं उत्तम शौच धर्मांड़गाय नमः” का जाप, हमें पवित्रता और संतोष को सिर्फ एक विचार नहीं, बल्कि एक व्यवहार बनाने की शक्ति देता है।

आइए, इस पावन दिन हम सब मिलकर लोभ को त्यागें, संतोष और पवित्रता को अपनाएं, और इस तरह व्यक्तिगत कल्याण के साथ-साथ विश्व कल्याण में भी अपना योगदान दें।

 

Sudeep Kumar Jain

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