
जय जिनेन्द्र!
पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व के पांचवें दिन, आज, सोमवार, 01 सितंबर 2025 को भाद्रपद शुक्ल नवमी के पावन अवसर पर हम उत्तम सत्य धर्म की आराधना कर रहे हैं। उत्तम सत्य, जिसका अर्थ है ‘सर्वोत्तम सत्य’ या ‘सत्यनिष्ठा’, दसलक्षण धर्मों में एक ऐसा सिद्धांत है जो हमें केवल सच बोलने तक ही सीमित नहीं रखता, बल्कि मन, वचन और कर्म में पूर्ण सत्यता लाने की प्रेरणा देता है।
उत्तम सत्य: संसार सागर से मुक्ति का मार्ग
‘उत्तम सत्य वचन मुख बोले, सो प्राणी संसार न डोले।’ – यह सूक्ति उत्तम सत्य के मूल को दर्शाती है। इसका अर्थ है कि जिसकी वाणी और जीवन में सत्य धर्म अवतरित हो जाता है, उसकी संसार सागर से मुक्ति एकदम निश्चित है। सत्य, जैन दर्शन के अनुसार, आत्मा का एक स्वाभाविक गुण है। जब हम झूठ बोलते हैं, तो हम अपनी आत्मा को कर्मों के बंधन से बांधते हैं और अपनी प्रकृति के विरुद्ध जाते हैं।
उत्तम सत्य का पालन करना सिर्फ मौखिक सत्य तक सीमित नहीं है। यह जीवन के हर पहलू में निष्कपटता और प्रामाणिकता लाने का नाम है। यह हमें यह सिखाता है कि हम अपने जीवन को दिखावे और झूठे वादों से दूर रखें। जब हम सत्य का पालन करते हैं, तो हमारे भीतर से डर, छल और कपट की भावनाएं खत्म हो जाती हैं।
उत्तम सत्य: व्यक्तिगत, सामाजिक और विश्व कल्याण का आधार
उत्तम सत्य का पालन व्यक्ति से लेकर संपूर्ण विश्व तक हर स्तर पर कल्याणकारी है:
व्यक्तिगत कल्याण: जब हम सत्यवादी होते हैं, तो हमारा मन शांत और निर्भय होता है। हमें अपने झूठ को छिपाने का बोझ नहीं उठाना पड़ता। सत्य हमें आंतरिक शक्ति और आत्मविश्वास देता है, जो मोक्ष मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए आवश्यक है। सत्यनिष्ठा से हमें आत्म-ज्ञान की प्राप्ति होती है और हम अपनी आत्मा के वास्तविक स्वरूप को जान पाते हैं।
सामाजिक समरसता: सत्य पर ही विश्वास और रिश्ते टिके होते हैं। जब एक समाज में हर व्यक्ति सत्यनिष्ठा से काम करता है, तो वहां सामाजिक समरसता और भाईचारा बढ़ता है। प्रशासन, शासन, और व्यापार में सत्य का पालन करने से भ्रष्टाचार खत्म होता है और एक न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित होती है। जब लोग एक-दूसरे पर भरोसा कर सकते हैं, तो समाज अधिक मजबूत और संगठित होता है।
विश्व शांति और सद्भाव: आज विश्व में जो भी युद्ध, संघर्ष और आर्थिक असमानता है, उसका एक बड़ा कारण झूठ, छल और धोखे का बोलबाला है। जब वैश्विक शक्तियां, राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं निष्पक्ष और सत्यनिष्ठ हों, तो संपूर्ण जगत में प्रेम, विश्वास और मंगलमय वातावरण कल्याणकारी होगा। उत्तम सत्य का पालन करने से राष्ट्र आपसी समझौतों में पारदर्शिता ला सकते हैं, जिससे विवादों का शांतिपूर्ण समाधान हो सकता है। यह हमें सिखाता है कि हम सब एक हैं और सत्य ही वह पुल है जो हमें एक-दूसरे से जोड़ सकता है।
उत्तम सत्य की साधना का मनोवैज्ञानिक पहलू
मनोवैज्ञानिक रूप से भी, सत्य बोलना हमें तनाव से मुक्त करता है। झूठ बोलने से मन में चिंता और अपराधबोध पैदा होता है। सत्यनिष्ठा हमें एक प्रामाणिक जीवन जीने में मदद करती है, जिससे हमारे मानसिक स्वास्थ्य में सुधार होता है और हम अधिक सकारात्मक रहते हैं।
पर्युषण पर्व के पांचवें दिन की पूजन विधि और महत्व
आज के दिन की पूजा, स्वाध्याय और जाप विधि हमें उत्तम सत्य के सार को समझने में मदद करती है:
देव, शास्त्र, गुरु/पंचपरमेष्ठी/नवदेवता पूजन: हम उन महान आत्माओं की आराधना करते हैं जिन्होंने हमें सत्य का मार्ग दिखाया।
चौबीसी पूजन (24 तीर्थंकर): तीर्थंकरों ने अपने जीवन में पूर्ण सत्य का पालन किया और परम ज्ञान को प्राप्त किया। उनकी पूजा हमें प्रेरणा देती है।
मूलनायक तीर्थंकर पूजन: अपनी श्रद्धा को मूलनायक भगवान के चरणों में समर्पित करें।
सोलह कारण पूजन: यह हमें आत्मा की शुद्धि और तीर्थंकर पद के लिए आवश्यक गुणों को समझने में मदद करता है।
पंचमेरु पूजन: यह पूजा हमें अपनी आत्मा की स्थिरता का स्मरण कराती है।
दसलक्षण पूजन: दसलक्षण धर्मों की पूजा करके इन गुणों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें।
स्वाध्याय: धर्म ध्यान के लिए स्वाध्याय (शास्त्रों का अध्ययन), विशेष रूप से तत्त्वार्थसूत्र ग्रंथ के सभी 357 सूत्रों का शुद्ध पाठ अवश्य करें और प्रतिदिन एक अध्याय का स्वाध्याय करने से विशेष कर्म निर्जरा होती है, जिससे हमें सत्य धर्म को समझने और अपनाने में मदद मिलती है।
स्वयंभू स्तोत्र: पूजन की समाप्ति के पहले, समुच्चय महा अर्घ के पहले, स्वयंभू स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन करें। यह मन को एकाग्र करता है।
और अंत में, “ॐ ह्रीं उत्तम सत्य धर्मांड़गाय नमः” का जाप, हमें सत्य को सिर्फ एक विचार नहीं, बल्कि एक व्यवहार बनाने की शक्ति देता है।
आइए, इस पावन दिन हम सब मिलकर सत्य को अपने जीवन का आधार बनाएं और इस तरह व्यक्तिगत कल्याण के साथ-साथ समाज और विश्व कल्याण में भी अपना योगदान दें।
Sudeep Kumar Jain