Uttam Aakinchanya Das Lakshan Dharma Jain Festival Poster HD

जय जिनेन्द्र!

पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व के नवें दिन, आज, शुक्रवार, 05 सितंबर 2025 को भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी के पावन अवसर पर हम उत्तम आकिंचन्य धर्म की आराधना कर रहे हैं। उत्तम आकिंचन्य का अर्थ ‘सर्वोत्तम अपरिग्रह’ या ‘कुछ भी मेरा नहीं’ का भाव है। यह दसलक्षण धर्मों में एक ऐसा सिद्धांत है जो हमें सिर्फ वस्तुओं का त्याग करने तक ही सीमित नहीं रखता, बल्कि उन वस्तुओं के प्रति होने वाले ‘ममत्व’ (मेरापन) का भी त्याग करने की प्रेरणा देता है।

उत्तम आकिंचन्य: ममत्व पर विजय और मोक्ष

‘उत्तम अंकिचन व्रत धारे, परम समाधि दशा विस्तारे।’ – यह सूक्ति उत्तम आकिंचन्य के मूल को दर्शाती है। इसका अर्थ है कि जिस व्यक्ति ने अंतर और बाहर, 24 प्रकार के परिग्रहों (संग्रह) का त्याग कर दिया है, वही परम समाधि और मोक्ष सुख पाने का अधिकारी होता है।

आकिंचन्य धर्म हमें यह सिखाता है कि हम न केवल धन, संपत्ति और अन्य सांसारिक वस्तुओं के प्रति, बल्कि अपने शरीर और उन त्याग की गई वस्तुओं के प्रति भी ममत्व न रखें। क्योंकि कई बार सब कुछ त्यागने पर भी उस त्याग के प्रति एक प्रकार का गर्व या ममत्व हो सकता है। आकिंचन्य धर्म हमें उस ममत्व का भी त्याग करने को कहता है, जो उत्कृष्ट समाधि और मोक्ष के लिए आवश्यक है। यह हमारे जीवन के उच्चतम स्तर की समझ है, जो आज के भौतिकवादी युग को वास्तविक आध्यात्मिकता का मौलिक दिशा-निर्देश देती है।

उत्तम आकिंचन्य: व्यक्तिगत, सामाजिक और विश्व कल्याण का आधार

उत्तम आकिंचन्य का पालन व्यक्ति, समाज और संपूर्ण विश्व के लिए अत्यंत लाभकारी है:

  • व्यक्तिगत कल्याण: ममत्व का त्याग हमें मानसिक शांति और स्वतंत्रता प्रदान करता है। जब हम किसी भी चीज के ‘मेरे होने’ के भाव से मुक्त हो जाते हैं, तो हमारा मन शांत और स्थिर हो जाता है। यह हमें जीवन में खुशी, संतोष और आत्म-ज्ञान की ओर ले जाता है।

  • सामाजिक प्रेरणा और उत्थान: जब कोई व्यक्ति या समुदाय बिना किसी आसक्ति के जीवन जीता है, तो वह समाज के लिए एक महान प्रेरणा स्रोत बनता है। यह उच्च आदर्श भौतिकवादी सोच को चुनौती देते हैं और लोगों को यह सिखाते हैं कि वास्तविक सुख वस्तुओं के संग्रह में नहीं, बल्कि आत्मिक स्वतंत्रता में है। यह सोच समाज में समानता और भाईचारे को बढ़ावा देती है।

  • विश्व कल्याण: आज विश्व में जो भी पर्यावरणीय समस्याएं, आर्थिक असमानता और संघर्ष हैं, उनका एक बड़ा कारण देशों और समुदायों का संसाधनों के प्रति ममत्व और अत्यधिक संग्रह की प्रवृत्ति है। जब हम आकिंचन्य के सिद्धांत को अपनाते हैं, तो हम अनावश्यक उपभोग और संग्रह से बचते हैं, जिससे प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कम होता है। यह एक ऐसा उच्च आदर्श है जो वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए आवश्यक है।

उत्तम आकिंचन्य की साधना का वैज्ञानिक पहलू

मनोवैज्ञानिक रूप से भी, ममत्व का त्याग हमें तनाव और चिंता से मुक्त करता है। जब हम किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति अत्यधिक आसक्त होते हैं, तो उसके खोने का डर हमें हमेशा परेशान करता है। आकिंचन्य हमें इस डर से मुक्त कर एक संतुलित और स्थिर जीवन जीने में मदद करता है।

पर्युषण पर्व के नवें दिन की पूजन विधि और महत्व

आज के दिन की पूजा, स्वाध्याय और जाप विधि हमें उत्तम आकिंचन्य के सार को समझने में मदद करती है:

  • देव, शास्त्र, गुरु/पंचपरमेष्ठी/नवदेवता पूजन: हम उन महान आत्माओं की पूजा करते हैं जिन्होंने ममत्व का त्याग कर मोक्ष प्राप्त कराने वाले आकिंचन्य धर्म का ज्ञान दिया। 

  • चौबीसी पूजन (24 तीर्थंकर): तीर्थंकरों ने अपने जीवन में पूर्ण आकिंचन्य का पालन किया। उनकी पूजा हमें प्रेरणा देती है।

  • मूलनायक तीर्थंकर पूजन: अपनी श्रद्धा को मूलनायक भगवान के चरणों में समर्पित करें।

  • सोलह कारण पूजन: यह हमें आत्मा की शुद्धि और तीर्थंकर पद के लिए आवश्यक गुणों को समझने में मदद करता है।

  • दसलक्षण पूजा: दसलक्षण धर्मों की पूजा करके इन गुणों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें।

  • रत्नत्रय पूजन: रत्नत्रय (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र) की आराधना हमें आकिंचन्य धर्म के महत्व को समझने में मदद करती है।

  • स्वयंभू स्तोत्र: पूजन की समाप्ति के पहले, समुच्चय महा अर्घ के पहले, स्वयंभू स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन करें। यह मन को एकाग्र करता है।
  • स्वाध्याय: धर्म ध्यान के लिए स्वाध्याय (शास्त्रों का अध्ययन), विशेष रूप से तत्त्वार्थसूत्र ग्रंथ के सभी 357 सूत्रों का शुद्ध पाठ अवश्य करें और प्रतिदिन एक अध्याय का स्वाध्याय करने से विशेष कर्मों की निर्जरा होती है।

और अंत में, “ॐ ह्रीं उत्तम आकिंचन धर्मांड़गाय नमः” का जाप, हमें आकिंचन्य को सिर्फ एक विचार नहीं, बल्कि एक व्यवहार बनाने की शक्ति देता है।

आइए, इस पावन दिन हम सब मिलकर ममत्व का त्याग करें, आकिंचन्य को अपने जीवन का आधार बनाएं और इस तरह व्यक्तिगत कल्याण के साथ-साथ समाज और विश्व कल्याण में भी अपना योगदान दें।

 

Sudeep Kumar Jain

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