
जय जिनेन्द्र!
पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन, आज, शनिवार, 30 अगस्त 2025 को भाद्रपद शुक्ल सप्तमी के पावन अवसर पर हम उत्तम आर्जव धर्म की आराधना कर रहे हैं। इस दिन को शील सप्तमी के नाम से भी जाना जाता है, जो शील और सरलता के महत्व को दर्शाता है। उत्तम आर्जव, जिसका अर्थ है ‘सर्वोत्तम सरलता’ या ‘निष्कपटता’, दसलक्षण धर्मों में एक ऐसा सिद्धांत है जो हमें मन, वचन और कर्म की एकता सिखाता है।
उत्तम आर्जव: कपट से मुक्ति का मार्ग
‘उत्तम आर्जव कपट मिटावे, दुर्गति त्यागि सुगति उपजावें।’ – यह सूक्ति आर्जव धर्म के मर्म को बखूबी समझाती है। इसका अर्थ है कि उत्तम आर्जव धर्म अपनाने से मन एकदम निष्कपट तथा राग-द्वेष से रहित हो जाता है। यह हमें दिखावे की जिंदगी से दूर रहकर, अपने वास्तविक स्वरूप में जीने की प्रेरणा देता है। जहां मन में कुछ और, वाणी में कुछ और और कर्मों में कुछ और हो, वहीं कपट का वास होता है। आर्जव हमें इस कपट से मुक्ति दिलाकर एक सहज और सरल जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करता है।
सरल हृदय व्यक्तियों के घर में लक्ष्मी का भी स्थायी वास रहता है। यह केवल भौतिक लक्ष्मी की बात नहीं है, बल्कि आंतरिक शांति, संतोष और सुख की लक्ष्मी की बात है, जो एक निष्कपट व्यक्ति को स्वाभाविक रूप से प्राप्त होती है।
उत्तम आर्जव: व्यक्तिगत कल्याण और प्रकृति संरक्षण
उत्तम आर्जव का पालन व्यक्तिगत स्तर पर हमें मानसिक शांति और सामाजिक स्तर पर विश्वास दिलाता है। लेकिन, इसके व्यापक प्रभाव प्रकृति और विश्व कल्याण पर भी दिखते हैं:
व्यक्तिगत कल्याण और आत्म-शुद्धि: जब हमारा मन, वचन और कर्म एक होते हैं, तो हम स्वयं के प्रति ईमानदार होते हैं। यह ईमानदारी हमें आंतरिक शांति देती है और हमारी आत्मा को शुद्ध करती है। निष्कपट जीवन जीने वाला व्यक्ति स्वयं को अधिक स्वीकार करता है और अनावश्यक तनाव से मुक्त रहता है। यही आत्म-शुद्धि मोक्ष मार्ग पर अग्रसर होने का आधार है।
सामाजिक विश्वास और सद्भाव: छल-कपट से मुक्त व्यवहार समाज में विश्वास और सद्भाव का माहौल बनाता है। जब लोग एक-दूसरे पर भरोसा कर सकते हैं, तो रिश्ते मजबूत होते हैं और समुदाय अधिक एकजुट होता है। यह समाज को स्थिरता और शांति प्रदान करता है।
प्रकृति संरक्षण और विश्व कल्याण: उत्तम आर्जव हमें अनावश्यक प्रदर्शन और उपभोग से दूर रहने की प्रेरणा देता है। ‘Simplicity’ (सरलता) को अपनाकर हम अपनी आवश्यकताओं को सीमित करते हैं। दिखावे और ब्रांडेड वस्तुओं की अंधी दौड़ में, हम अक्सर उन उत्पादों का उपभोग करते हैं जिनकी हमें वास्तव में ज़रूरत नहीं होती, जैसे कि अत्यधिक सौंदर्य प्रसाधन, फैशन के उत्पाद और अन्य अनावश्यक वस्तुएं। ये उत्पाद अक्सर पर्यावरण को दूषित करने वाले रसायनों से बनते हैं और इनके उत्पादन से प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन होता है।
जब हम आर्जव धर्म का पालन करते हुए सादगी को अपनाते हैं, तो हम अनावश्यक उपभोग से बचते हैं। इससे प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव कम होता है, प्रदूषण घटता है और हम प्रकृति के विनाश को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह सीधा संबंध है कि कैसे हमारी आंतरिक निष्कपटता और बाहरी सादगी प्रकृति का संरक्षण कर विश्व कल्याण में सहायक हो सकती है। ‘कम उपभोग’ ही प्रकृति को बचाने का सबसे सरल और सीधा मार्ग है।
उत्तम आर्जव की साधना का मनोवैज्ञानिक पहलू
मनोवैज्ञानिक रूप से भी, निष्कपटता और सरलता हमें अधिक प्रामाणिक जीवन जीने में मदद करती है। दिखावे का बोझ हमें तनावग्रस्त रखता है। सरल और निष्कपट व्यक्ति कम चिंता करते हैं, अधिक आत्मविश्वासी होते हैं और दूसरों के साथ गहरे, सार्थक संबंध बना पाते हैं।
पर्युषण पर्व के तीसरे दिन की पूजन विधि और महत्व
आज के दिन की पूजा, स्वाध्याय और जाप विधि हमें उत्तम आर्जव के सार को समझने में मदद करती है:
देव, शास्त्र, गुरु/पंचपरमेष्ठी/नवदेवता पूजन: उन परम पूज्य गुरुओं की आराधना करें जिन्होंने हमें निष्कपटता का मार्ग दिखाया।
चौबीसी पूजन (24 तीर्थंकर): तीर्थंकरों ने अपने जीवन में पूर्ण आर्जव का पालन किया। उनकी पूजा हमें प्रेरणा देती है।
मूलनायक तीर्थंकर पूजन: अपनी श्रद्धा को मूलनायक भगवान के चरणों में समर्पित करें।
सोलह कारण पूजन: यह हमें आत्मा की शुद्धि और तीर्थंकर पद के लिए आवश्यक गुणों को समझने में मदद करता है।
पंचमेरु पूजन: यह पूजा हमें अपनी आत्मा की स्थिरता का स्मरण कराती है।
दसलक्षण पूजन: दसलक्षण धर्मों की पूजा करके इन गुणों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें।
स्वाध्याय: धर्म ध्यान के लिए स्वाध्याय (शास्त्रों का अध्ययन), विशेष रूप से तत्त्वार्थसूत्र ग्रंथ के सभी 357 सूत्रों का शुद्ध पाठ अवश्य करें और प्रतिदिन एक अध्याय का स्वाध्याय करने से विशेष कर्म निर्जरा होती है, जिससे हमें आर्जव धर्म को समझने और अपनाने में मदद मिलती है।
स्वयंभू स्तोत्र: पूजन की समाप्ति के पहले, समुच्चय महा अर्घ के पहले, स्वयंभू स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन करें। यह मन को एकाग्र करता है।
और अंत में, “ॐ ह्रीं उत्तम आर्जव धर्मांड़गाय नमः” का जाप, हमें आर्जव को सिर्फ एक विचार नहीं, बल्कि एक व्यवहार बनाने की शक्ति देता है।
आइए, इस पावन दिन हम सब मिलकर छल-कपट को त्यागें, सरलता और निष्कपटता को अपनाएं, और इस तरह व्यक्तिगत कल्याण के साथ-साथ प्रकृति और विश्व कल्याण में भी अपना योगदान दें।
Sudeep Kumar Jain
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Haryank yadav
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