जय जिनेन्द्र!

पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व के दूसरे दिन, आज भाद्रपद शुक्ल षष्ठी के पावन अवसर पर हम उत्तम मार्दव धर्म की आराधना कर रहे हैं। उत्तम मार्दव का शाब्दिक अर्थ है आत्मा के सर्वश्रेष्ठ पुरुषार्थ से मान कषाय का मर्दन करना अथवा अहंकार को पूरी तरह से अपने मन से हटाना।  उत्तम मार्दव, जिसका भावार्थ है ‘सर्वोत्तम कोमलता’ या ‘विनम्रता’, जैन दर्शन के दसलक्षण धर्मों में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है। यह अहंकार, गर्व और अभिमान जैसे विकारों को समाप्त करने का मार्ग है।

उत्तम मार्दव: अहंकार पर विजय का मार्ग

अहंकार वह विष है जो मनुष्य को भीतर से खोखला कर देता है। यह मनुष्य को ऊँचाई से गिराता है और उसकी आत्मा की प्रगति को रोकता है। जैन धर्म हमें सिखाता है कि अहंकार हमारी आत्मा की अशुद्धता का प्रतीक है। जब हम अपनी जाति, धन, पद या ज्ञान का घमंड करते हैं, तो हम अपनी आत्मा के स्वाभाविक गुणों को भूल जाते हैं।

उत्तम मार्दव इस घमंड को तोड़ने का सबसे प्रभावी हथियार है। यह हमें यह सिखाता है कि सभी जीव समान हैं और किसी भी प्रकार का गर्व व्यर्थ है। विनम्रता वह गुण है जो हमें अपने ज्ञान और उपलब्धियों को दूसरों की सेवा में लगाने के लिए प्रेरित करता है, न कि उन्हें अपनी बड़ाई का साधन बनाने के लिए।

उत्तम मार्दव: व्यक्तिगत, सामाजिक और विश्वव्यापी प्रभाव

उत्तम मार्दव का पालन न केवल हमारे व्यक्तिगत जीवन को बेहतर बनाता है, बल्कि यह समाज और विश्व के कल्याण के लिए भी आवश्यक है।

  • व्यक्तिगत कल्याण: जब हम विनम्र होते हैं, तो हम अपने मन में शांति और संतोष का अनुभव करते हैं। यह हमें सीखने के लिए हमेशा तैयार रखता है और हमें दूसरों के विचारों का सम्मान करना सिखाता है। विनम्र व्यक्ति आसानी से ज्ञान प्राप्त करता है और जीवन में सही निर्णय लेता है। आत्मा के विकास या मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर होने के लिए अहंकार को त्यागना सबसे महत्वपूर्ण है। जब तक आत्मा में मान कषाय रहेगी, तब तक वह कर्मों के बंधन से मुक्त नहीं हो सकती।

  • सामाजिक समरसता: अहंकार और गर्व सामाजिक संघर्षों का एक प्रमुख कारण हैं। उत्तम मार्दव का अभ्यास हमें दूसरों का सम्मान करना, उनके साथ सहयोग करना और बिना किसी भेदभाव के जीना सिखाता है। जब समाज में विनम्रता का भाव होता है, तो वहाँ प्रेम, सौहार्द और भाईचारा पनपता है।

  • विश्व शांति: विश्व स्तर पर, विनम्रता ही वह गुण है जो राष्ट्रों को शांतिपूर्ण समाधानों की ओर प्रेरित कर सकता है, युद्धों और संघर्षों को टाल सकता है। यह हमें यह सिखाता है कि हम सब एक हैं और हमें मिलकर इस दुनिया को एक बेहतर जगह बनाना है।

उत्तम मार्दव की साधना का वैज्ञानिक पहलू

मनोवैज्ञानिक रूप से भी, विनम्रता के कई फायदे हैं। यह तनाव को कम करती है, दूसरों के साथ बेहतर रिश्ते बनाने में मदद करती है, और हमें जीवन में अधिक सकारात्मक बनाती है। विनम्र व्यक्ति दूसरों से आसानी से सीखते हैं, जिससे उनके व्यक्तिगत विकास में मदद मिलती है।

पर्युषण पर्व के दूसरे दिन की पूजन विधि और उसका महत्व

आज के दिन की पूजा, स्वाध्याय और जाप विधि हमें उत्तम मार्दव के सार को समझने में मदद करती है:

  • देव, शास्त्र, गुरु/पंचपरमेष्ठी/नवदेवता पूजन: हम उन महान आत्माओं की पूजा करते हैं जिन्होंने हमें यह ज्ञान दिया।

  • चौबीसी पूजन (24 तीर्थंकर): तीर्थंकरों ने अपने जीवन में पूर्ण विनम्रता का पालन किया। उनकी पूजा हमें प्रेरणा देती है।

  • मूलनायक तीर्थंकर पूजन: यह हमारी व्यक्तिगत श्रद्धा का प्रतीक है।

  • सुपार्श्वनाथ भगवान की पूजन (गर्भ कल्याणक): आज के दिन सुपार्श्वनाथ भगवान का गर्भ कल्याणक भी मनाया जाता है। उनकी पूजा हमें उनके त्याग और विनम्रता का स्मरण कराती है।

  • सोलह कारण पूजन: यह हमें विनम्रता के महत्व को समझने में मदद करता है, जो तीर्थंकर पद के लिए एक आवश्यक गुण है।

  • पंचमेरु पूजन: यह हमें अपनी आत्मा की स्थिरता और विनम्रता का स्मरण कराती है।

  • दसलक्षण पूजन: आज हम दसलक्षण धर्मों की पूजा करके इन दस गुणों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लेते हैं।

  • स्वाध्याय: धर्म ध्यान के लिए स्वाध्याय (शास्त्रों का अध्ययन) एक महत्वपूर्ण क्रिया है जो हमें आत्म-ज्ञान और विनम्रता प्रदान करती है।

  • स्वयंभू स्तोत्र: इस स्तोत्र का पाठ मन को एकाग्र करता है और हमें अपनी आत्मा के स्वरूप का बोध कराता है।

और अंत में, “ॐ ह्रीं उत्तम मार्दव धर्मांड़गाय नमः” का जाप, हमें विनम्रता को सिर्फ एक विचार नहीं, बल्कि एक व्यवहार बनाने की शक्ति देता है।

आइए, इस पावन दिन हम सब मिलकर अपने अहंकार को त्यागने का संकल्प लें और उत्तम मार्दव धर्म का पालन करके अपने जीवन को सार्थक बनाएं।

 

Sudeep Kumar Jain

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