Uttam Tap Das Lakshan Dharma Jain Festival Poster HD

जय जिनेन्द्र!

पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व के सातवें दिन, आज, बुधवार, 03 सितंबर 2025 को भाद्रपद शुक्ल एकादशी के पावन अवसर पर हम उत्तम तप धर्म की आराधना कर रहे हैं। उत्तम तप, जिसका अर्थ ‘सर्वोत्तम तपस्या’ है, दसलक्षण धर्मों में एक ऐसा सिद्धांत है जो हमें इच्छाओं पर विजय प्राप्त करके आत्म-शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाता है।

उत्तम तप: कर्म शत्रुओं का नाश

‘उत्तम तप निरवांछित पाले, सो नर कर्मशत्रु को टाले।’ – यह सूक्ति तप के मूल महत्व को दर्शाती है। इसका अर्थ है कि शास्त्रों में वर्णित बारह प्रकार के तप से जो मानव अपने तन-मन-जीवन को परिमार्जित या शुद्ध करता है, उसके समस्त जन्मों-जन्मों के कर्म नष्ट हो जाते हैं। तप का सीधा अर्थ है इच्छाओं को जीतना। यह हमारी आत्मा को कर्मों के बोझ से मुक्त करने का सबसे शक्तिशाली साधन है।

तप सिर्फ शरीर को कष्ट देना नहीं है, बल्कि अपनी इंद्रियों, मन और विचारों को अनुशासित करना है। जब हम इच्छाओं पर नियंत्रण पाते हैं, तो हमारी आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है और ज्ञानावरणीय आदि कर्मो का क्षयोत्शम होता है। यह हमें सांसारिक मोहमाया से ऊपर उठाकर आत्मिक शांति और आनंद की ओर ले जाता है।

तप के बारह प्रकार: आत्मिक विकास के सोपान

जैन धर्म में तप के बारह प्रकार बताए गए हैं, जिनमें से छह बहिरंग (बाहरी) और छह अंतरंग (आंतरिक) तप हैं। ये सभी मिलकर हमारी आत्मा को शुद्ध करते हैं:

बहिरंग तप (Outer Austerities):

  1. अनशन तप: चार प्रकार के आहार का त्याग करना (उपवास)।

  2. ऊनोदर तप: भूख से कम भोजन करना।

  3. वृत्तिपरिसंख्यान तप: भोजन को जाते समय अटपटी प्रतिज्ञा लेना (जैसे आज पहले चौके में ही विधि मिलती है तो ही आहार लूँगा)।

  4. रसपरित्याग तप: छहों रसों (मीठा, खट्टा, कड़वा, कसैला, तीखा, नमकीन) या एक-दो रसों का त्याग करना।

  5. विविक्त शय्यासन तप: स्वाध्याय, ध्यान आदि की सिद्धि के लिए एकांत तथा पवित्र स्थान में सोना-बैठना।

  6. कायक्लेश तप: शरीर को वश करने के लिए उसे सर्दी-गर्मी आदि का कष्ट सहना।

अंतरंग तप (Inner Austerities):

  1. प्रायश्चित तप: दोषों की शुद्धि के लिए दंड ग्रहण करना।

  2. विनय तप: रत्नत्रय (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र) व उसके धारकों की विनय करना।

  3. वैयावृत्य तप: रोगी या वृद्ध मुनि की सेवा करना।

  4. स्वाध्याय तप: शास्त्रों का पढ़ना-पढ़ाना, विचारना और उपदेश देना।

  5. व्युत्सर्ग तप: शरीर से ममता छोड़ना।

  6. ध्यान तप: एकाग्रता से आत्म चिंतन करना।

उत्तम तप: व्यक्तिगत, सामाजिक और विश्व कल्याण का आधार

तप का अभ्यास केवल व्यक्तिगत आध्यात्मिक प्रगति तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज और विश्व के लिए भी कल्याणकारी है:

  • व्यक्तिगत कल्याण और आध्यात्मिक शक्ति: तप के माध्यम से इच्छाओं को जीतने पर कर्मों के क्षय होने से व्यक्ति का आभामंडल पवित्र होता है। इससे आध्यात्मिक शक्ति और ज्ञान का विकास होता है। यह ज्ञान व्यक्ति को सही-गलत का बोध कराता है और उसे आंतरिक शांति व असीम आनंद की प्राप्ति होती है। यह मोक्ष मार्ग का एक सशक्त साधन है।

  • सामाजिक उत्थान और उदाहरण: संयमी और तपस्वी व्यक्ति समाज के लिए एक प्रेरणा स्रोत बनते हैं। उनका जीवन यह सिखाता है कि भौतिक सुखों के पीछे भागने के बजाय आत्मिक शांति में वास्तविक सुख है। इससे समाज में उपभोगवाद और लालच कम होता है, जिससे सामाजिक समरसता बढ़ती है।

  • विश्व कल्याण और नैतिक नेतृत्व: जब व्यक्ति तप के माध्यम से अपनी इंद्रियों और मन पर नियंत्रण प्राप्त कर लेता है, तो वह निष्पक्ष और न्यायप्रिय बनता है। ऐसे व्यक्तियों द्वारा शासित प्रशासन, शासन और वैश्विक शक्तियां अधिक ईमानदारी और करुणा के साथ काम करती हैं। तप से प्राप्त आध्यात्मिक ज्ञान और शक्ति उन्हें सही निर्णय लेने में मदद करती है, जिससे संपूर्ण जगत में प्रेम, विश्वास और मंगलमय वातावरण बनता है। यह विश्व में संघर्षों को कम करके शांति और सहयोग को बढ़ावा देता है।

उत्तम तप की साधना का वैज्ञानिक पहलू

आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि इच्छाओं पर नियंत्रण और आत्म-अनुशासन से मानसिक दृढ़ता बढ़ती है। व्रत, ध्यान और संयमित जीवनशैली तनाव को कम करती है, मानसिक स्पष्टता लाती है और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार करती है।

पर्युषण पर्व के सातवें दिन की पूजन विधि और महत्व

आज के दिन की पूजा, स्वाध्याय और जाप विधि हमें उत्तम तप के सार को समझने में मदद करती है:

  • देव, शास्त्र, गुरु/पंचपरमेष्ठी/नवदेवता पूजन: हम उन महान आत्माओं की आराधना करते हैं जिन्होंने तप के मार्ग से मोक्ष प्राप्त किया।

  • चौबीसी पूजन (24 तीर्थंकर): तीर्थंकरों ने अपने जीवन में चरम तपस्या का पालन किया। उनकी पूजा हमें प्रेरणा देती है।

  • मूलनायक तीर्थंकर पूजन: अपनी श्रद्धा को मूलनायक भगवान के चरणों में समर्पित करें।

  • सोलह कारण पूजन: यह हमें आत्मा की शुद्धि और तीर्थंकर पद के लिए आवश्यक गुणों को समझने में मदद करता है।

  • दसलक्षण पूजन: दसलक्षण धर्मों की पूजा करके इन गुणों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें।

  • स्वयंभू स्तोत्र: पूजन की समाप्ति के पहले, समुच्चय महा अर्घ के पहले, स्वयंभू स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन करें। यह मन को एकाग्र करता है।
  • स्वाध्याय: धर्म ध्यान के लिए स्वाध्याय (शास्त्रों का अध्ययन), विशेष रूप से तत्त्वार्थसूत्र ग्रंथ के सभी 357 सूत्रों का शुद्ध पाठ अवश्य करें और प्रतिदिन एक अध्याय का स्वाध्याय करने से विशेष कर्म निर्जरा होती है। पाठ और स्वाध्याय से एक उपवास का फल तत्काल मिलता है और प्रतिदिन अशुभ कर्मों की असंख्यातगुणी निर्जरा होती है।

और अंत में, “ॐ ह्रीं उत्तम तप धर्मांड़गाय नमः” का जाप, हमें तप को सिर्फ एक विचार नहीं, बल्कि एक व्यवहार बनाने की शक्ति देता है।

आइए, इस पावन दिन हम सब मिलकर इच्छाओं पर विजय प्राप्त करें, तप को अपने जीवन का आधार बनाएं और इस तरह व्यक्तिगत कल्याण के साथ-साथ समाज और विश्व कल्याण में भी अपना योगदान दें।

सुदीप जैन

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