हाल ही में कुछ बौद्धिक विमर्शों और लेखों में यह तर्क देखने को मिला कि: “जीवन के दुखों से डरकर जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होने की चाह (मोक्ष) एक प्रकार का पलायनवाद (Escapism) है।” यह तर्क पहली नज़र में आधुनिक और ‘व्यावहारिक’ (Practical) लग सकता है। भौतिकवाद की दौड़ में भागती दुनिया को अक्सर यही लगता है कि ठहर जाना या मुक्त होने की बात करना जीवन की चुनौतियों से पीठ दिखाना है। लेकिन, जब हम जैन दर्शन (Jain Philosophy) की वैज्ञानिक गहराई में उतरते हैं, तो यह निष्कर्ष अत्यंत सतही और भ्रामक प्रतीत होता है।

आइए, इस भ्रांति का तार्किक विश्लेषण करें और समझें कि क्यों आधुनिक दुनिया इस विज्ञान को समझने में आज भी सदियों पीछे है।

मोक्ष और पलायनवाद: भ्रांति और सत्य

1. मोक्ष ‘पलायन’ (Escape) नहीं, ‘परम पुरुषार्थ’ (Ultimate Effort) है पलायनवाद का अर्थ है—जिम्मेदारियों से डरकर भाग जाना या कायरता। लेकिन जैन दर्शन में मोक्ष प्राप्ति का मार्ग कायरों का नहीं, बल्कि ‘वीरों’ का मार्ग है। एक पलायनवादी बाहरी परिस्थितियों से भागता है, जबकि मोक्ष का आकांक्षी अपनी भीतरी कमजोरियों (क्रोध, मान, माया, लोभ) से लड़ता है। दूसरों को हराना आसान है, लेकिन स्वयं की इंद्रियों और कषायों को जीतना सबसे बड़ा ‘पुरुषार्थ’ है। इसीलिए इस मार्ग पर चलने वाले को ‘महावीर’ या ‘जिन’ (विजेता) कहा जाता है।

2. मोक्ष किसी ‘धर्म के ठेकेदारों’ की गढ़ी हुई व्यवस्था नहीं है यह मानना कि पूर्वजन्म और मोक्ष महज एक ‘मान्यता’ है, अज्ञानता है। जैन धर्म में मोक्ष कोई थोपा गया विचार नहीं है; यह जीव की वास्तविक और शुद्ध अवस्था (Vastavik Swabhaav) है। जैसे पानी का मूल स्वभाव ‘शीतलता’ है, वैसे ही आत्मा का मूल स्वभाव ‘अनंत ज्ञान और अनंत सुख’ है। कर्मों की अशुद्धि हटने पर आत्मा का अपने मूल स्वभाव में लौट आना ही मोक्ष है। यह अंधविश्वास नहीं, बल्कि ‘आत्मानुभव’ (Self-realization) से पहचानी जाने वाली अवस्था है।

3. मोक्ष कोई ‘रिसॉर्ट’ (Destination) नहीं, ‘स्टेट ऑफ बीइंग’ है यह सोचना कि “मोक्ष कोई एक जगह है जहाँ जाकर बैठ जाना है,” सर्वथा गलत है। व्यावहारिक रूप से यह आत्मा की पूर्ण स्वतंत्र और वीतराग अवस्था है। जैन ‘करणानुयोग’ (Cosmology) के अनुसार, जब आत्मा कर्मों के भार से मुक्त होती है, तो वह अपने ‘ऊर्ध्वगमन स्वभाव’ (Upward nature) के कारण ब्रह्मांड के सर्वोच्च बिंदु—लोक के शिखर (सिद्धशिला)—पर जाकर ठहरती है। आधुनिक भौतिक विज्ञान (Modern Science), जिसके उपकरण केवल ‘पदार्थ’ (Matter) को मापने तक सीमित हैं, यदि इस विशुद्ध चेतना (Pure Consciousness) के सत्य पर शंका करता है, तो यह उस विज्ञान की अपनी सीमा (Limitation) है। चेतना के इस सर्वोच्च आयाम को भौतिक यंत्रों की सीमाओं के आधार पर नकार देना अतार्किक है।

4. शुरुआत ‘डर’ से नहीं, ‘करुणा’ (Compassion) से होती है एक पलायनवादी व्यक्ति स्वार्थी होता है, वह सिर्फ अपना दुख दूर करना चाहता है। लेकिन जैन दर्शन स्पष्ट कहता है कि मोक्ष मार्ग की शुरुआत संसार से नफरत या डर से नहीं, बल्कि ‘करुणा’ (Compassion) से होती है। जब साधक के हृदय में सभी जीवों के प्रति निस्वार्थ प्रेम जगता है और वह ‘संपूर्ण अहिंसा’ को जीवन में उतारता है, तभी मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

5. जैन धर्म कोई ‘सामाजिक समूह’ नहीं, ‘शाश्वत वस्तु स्वभाव का विज्ञान’ है यदि हम यह मान लें कि मोक्ष केवल एक कोरी ‘कल्पना’ है, तो फिर जैन धर्म, इसके तीर्थों और इस पूरी जीवन-पद्धति की आवश्यकता ही क्या रह जाती है? जैन धर्म कोई ऐसा ‘सामाजिक समूह’ (Social entity) नहीं है जिसे केवल अपने सामाजिक अधिकारों या पहचान को बचाने के लिए खड़ा किया गया हो। यह ‘शाश्वत वस्तु स्वभाव का विज्ञान’ है। यहाँ प्रत्येक द्रव्य (Substance) और विशेषकर जीव (Soul) का लक्ष्य अपने मूल स्वभाव (वास्तविक सुख) को प्राप्त करना है। जीव द्वारा अपने आत्म-कल्याण के लिए किए गए कार्य ही इस अस्तित्व की सही दिशा निर्धारित करते हैं। मोक्ष को नकारने का अर्थ है पूरे अस्तित्व के आधार को शून्य कर देना।


क्यों आज का विज्ञान और शिक्षा प्रणाली जैन दर्शन को समझने में 500 साल पीछे है?

जब जैन दर्शन में इतनी गहरी वैज्ञानिकता और मनोवैज्ञानिक सत्य छिपा है, तो फिर आधुनिक दुनिया इसे क्यों नहीं समझ पा रही? इसका उत्तर पिछले 500 वर्षों के मानव विकास की दिशा में छिपा है।

  • भौतिक प्रगति बनाम चेतना का पतन: पिछले 500 वर्षों में मानव सभ्यता का विकास पूरी तरह से ‘भौतिक’ (Material) और ‘तकनीकी’ रहा है। आधुनिक विज्ञान आज ‘क्वांटम फिजिक्स’ और ‘ऑब्जर्वेबल यूनिवर्स’ की बात कर रहा है, जबकि जैन ‘करणानुयोग’ में लोक (Universe), रज्जु और प्रदेश (Larger and Finer units of length and space) जैसी इकाइयां हजारों साल पहले सटीकता से परिभाषित थीं। आधुनिक विज्ञान पदार्थ के भीतर तो कुछ दूर तक गया, लेकिन ‘चेतना’ (Consciousness) के अध्ययन में वह आज भी शैशवावस्था में है।

  • मीडिया का ‘सेंसेशनालिज्म’ (Sensationalism): आज की मीडिया और सिनेमा ‘चमत्कार’, ‘विवाद’ और ‘हीरो बनाम विलेन’ के आसान फॉर्मूले पर चलती है। जैन दर्शन चमत्कारों पर नहीं, बल्कि ‘वीतरागता’ और ‘कर्म सिद्धांत’ पर टिका है। इसमें कोई ऐसा ईश्वर नहीं जो आसमान से आकर चमत्कार करेगा; यहाँ हर जीव अपने कर्मों का स्वयं निर्माता है। इस गहरी ‘सेल्फ-अकाउंटेबिलिटी’ को पर्दे पर उतारने के लिए जिस बौद्धिक स्तर की आवश्यकता है, वह आज की कमर्शियल मीडिया के पास नहीं है।

  • आधुनिक शिक्षा में एकांगी दृष्टिकोण: आज की शिक्षा प्रणाली तकनीकी रूप से उन्नत है, लेकिन वैचारिक रूप से एकांगी है। सत्ता और मुख्यधारा की व्यवस्थाएं हमेशा चीजों को ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ में देखना पसंद करती हैं। इसके विपरीत, जैन दर्शन का ‘अनेकांतवाद’ (Anekantavada) हर सत्य को कई दृष्टिकोणों से देखने की वकालत करता है। जो दर्शन मनुष्य को स्वतंत्र रूप से सोचना सिखाता हो, वह आज की भेड़-चाल वाली शिक्षा प्रणाली में आसानी से फिट नहीं बैठता। ‘Climate Change’ और ‘Conflict Resolution’ के लिए जैन दर्शन का अहिंसा और अपरिग्रह सबसे सटीक उत्तर है, फिर भी इसे शिक्षा की मुख्यधारा से दूर रखा गया है।

निष्कर्ष

मोक्ष जीवन से हार मानने का नाम नहीं है, बल्कि जीवन के सर्वोच्च शिखर को पा लेने का नाम है। मोक्ष संसार के दुखों से भागना नहीं है, बल्कि अपने भीतर छुपे उस ‘सुख-स्वभावी’ अस्तित्व को खोज लेना है, जिसके बाद बाहरी सुख-दुख का प्रभाव ही समाप्त हो जाता है।

यदि स्वयं को जानना, सबके प्रति करुणा रखना, और संपूर्ण अहिंसक होकर अपने शुद्ध स्वरूप को पा लेना आधुनिक विचारकों की दृष्टि में ‘पलायनवाद’ है… तो शायद आज की इस अशांत, युद्धग्रस्त और भौतिकता में अंधी हो चुकी मानवता को इसी तथाकथित ‘पलायनवाद’ की सबसे अधिक आवश्यकता है।


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सुदीप कुमार जैन

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