
जय जिनेन्द्र!
पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व, जिसे ‘पर्वों का राजा’ कहा जाता है, दस दिनों की एक आध्यात्मिक यात्रा है। यह हमें आत्मा से जोड़ने और विकारों को दूर करने का एक सुनहरा अवसर प्रदान करता है। इस महान पर्व का पहला दिन उत्तम क्षमा के लिए समर्पित है, जो कि दसलक्षण धर्मों में सबसे महत्वपूर्ण और मूलभूत सिद्धांत है। आज, भाद्रपद शुक्ल पंचमी को हम इसी पावन धर्म की गहराई में उतरेंगे।
उत्तम क्षमा: क्रोध पर विजय का मार्ग
‘उत्तम क्षमा’ का सीधा अर्थ है ‘सर्वोत्तम क्षमा’। यह केवल दूसरों को माफ़ करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अपने भीतर से क्रोध, अहंकार, और द्वेष की भावना को पूरी तरह से मिटा देने का नाम है। क्रोध, जिसे जैन धर्म में कषायों (आत्मा को दूषित करने वाले विकार) में से एक माना गया है, हमारी बुद्धि, विवेक और मन की शांति को नष्ट कर देता है। यह एक ऐसी आग है जो हमें भीतर ही भीतर जलाती रहती है।
जैन दर्शन हमें सिखाता है कि क्रोध एक बंधन है। जब हम किसी से क्रोधित होते हैं, तो हम उस व्यक्ति से सिर्फ बाहरी तौर पर ही नहीं, बल्कि कर्मों के सूक्ष्म धागों से भी जुड़ जाते हैं। यह बंधन हमारी आत्मा की प्रगति को रोकता है। उत्तम क्षमा का अभ्यास करके हम इन बंधनों को तोड़ते हैं और अपनी आत्मा को शुद्ध करते हैं। यह आत्म उत्थान की ओर हमारा पहला और सबसे निर्णायक कदम है।
उत्तम क्षमा: व्यक्तिगत और सार्वभौमिक प्रभाव
उत्तम क्षमा का पालन केवल हमारे व्यक्तिगत जीवन को ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व को बेहतर बना सकता है।
व्यक्तिगत कल्याण: जब हम क्षमा करते हैं, तो हम अपने मन से बोझ हटाते हैं। मानसिक शांति, तनाव से मुक्ति और सकारात्मकता हमारे जीवन में आती है। यह हमें स्वस्थ और संतुलित बनाता है। मन में कोई भी द्वेष न होने पर हम सहजता और सरलता से जीवन जीते हैं।
सामाजिक समरसता: परिवार, समाज और राष्ट्र में अक्सर संघर्ष का मूल कारण क्रोध और द्वेष होता है। उत्तम क्षमा का सिद्धांत हमें आपसी मतभेदों को भुलाकर प्रेम और सद्भावना के साथ रहना सिखाता है। जब हर व्यक्ति क्षमा के भाव को अपनाता है, तो समाज में सौहार्द और एकता का माहौल बनता है।
विश्व शांति: आज विश्वभर में युद्ध, हिंसा और घृणा का माहौल है। इन सभी समस्याओं का समाधान सिर्फ सैन्य शक्ति में नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों में है। अगर विश्व के नेता और आम नागरिक उत्तम क्षमा के सिद्धांत को अपना लें, तो आपसी संघर्ष और दुश्मनी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। क्षमा ही वह शक्ति है जो नफरत को प्रेम में बदल सकती है।
उत्तम क्षमा की साधना का वैज्ञानिक पहलू
आधुनिक मनोविज्ञान भी यह मानता है कि क्षमा करना हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत ज़रूरी है। जब हम किसी के प्रति गुस्सा या नफरत रखते हैं, तो हमारा शरीर तनाव हार्मोन (cortisol) का उत्पादन करता है, जिससे उच्च रक्तचाप और हृदय रोग जैसी समस्याएं हो सकती हैं। क्षमा करने से यह तनाव कम होता है और हम अधिक प्रसन्न रहते हैं।
पर्युषण पर्व के पहले दिन की पूजन विधि और उसका महत्व
आज के दिन की पूजा और जाप विधि हमें उत्तम क्षमा के सार को समझने में मदद करती है:
देव, शास्त्र, गुरु/पंचपरमेष्ठी/नवदेवता पूजन: हम उन महान आत्माओं की पूजा करते हैं जिन्होंने हमें इस ज्ञान को दिया।
चौबीसी पूजन (24 तीर्थंकर): तीर्थंकरों ने अपने जीवन में क्रोध और अहंकार को जीतकर परम शांति प्राप्त की। उनकी पूजा हमें प्रेरणा देती है।
मूलनायक तीर्थंकर पूजन: यह हमारी व्यक्तिगत श्रद्धा का प्रतीक है।
सोलह कारण पूजन: ये वे कारण हैं जो हमें तीर्थंकर पद की ओर ले जाते हैं, और उनमें से एक सबसे महत्वपूर्ण कारण ‘विनम्रता’ (मार्दव) भी है, जो क्षमा से जुड़ा है।
पंचमेरु पूजन: यह पूजा हमें अपनी आत्मा की स्थिरता और अडिगता का स्मरण कराती है।
दसलक्षण पूजन: आज हम दसलक्षण धर्मों की पूजा करते हैं, जो हमें इन दस गुणों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प दिलाते हैं।
स्वयंभू स्तोत्र: इस स्तोत्र का पाठ मन को एकाग्र करता है और हमें अपनी आत्मा के स्वरूप का बोध कराता है।
और अंत में, “ॐ ह्रीं उत्तम क्षमा धर्मांड़गाय नमः” का जाप, हमें क्षमा को सिर्फ एक विचार नहीं, बल्कि एक व्यवहार बनाने की शक्ति देता है।
आइये, इस पर्यूषण पर्व के पहले दिन हम सब मिलकर संकल्प लें कि हम अपने मन से क्रोध को हमेशा के लिए त्याग देंगे, ताकि हमारी आत्मा शुद्ध हो और यह विश्व एक बेहतर जगह बन सके।
सुदीप कुमार जैन
Bahut hi acchi tarah se samjhaya …. Padkr mn ko feel good hua … Thank you 👍🏻