Uttam Tyag Das Lakshan Dharma Jain Festival Poster HD

जय जिनेन्द्र!

पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व के आठवें दिन, आज, गुरुवार, 04 सितंबर 2025 को भाद्रपद शुक्ल द्वादशी के पावन अवसर पर हम उत्तम त्याग धर्म की आराधना कर रहे हैं। उत्तम त्याग, जिसका अर्थ ‘सर्वोत्तम त्याग’ है, दसलक्षण धर्मों में एक ऐसा सिद्धांत है जो हमें केवल वस्तुओं का त्याग करने तक ही सीमित नहीं रखता, बल्कि अपनी इच्छाओं, मोह और ममत्व का त्याग करने की प्रेरणा देता है।

उत्तम त्याग: मुक्ति और सम्मान का मार्ग

‘उत्तम त्याग करे जो कोई, भोगभूमि सुर शिवसुख होई।’ – यह सूक्ति त्याग के महत्व को दर्शाती है। इसका अर्थ है कि उत्तम त्याग करने वाले व्यक्ति को मुक्ति वधु स्वयंमेव वरण करती है तथा देवता भी उसे नमस्कार करते हैं। त्याग का सीधा अर्थ है ‘परिग्रह की निवृत्ति’ यानी संग्रह करने की प्रवृत्ति को खत्म करना। यह हमारी आत्मा को सांसारिक बंधनों से मुक्त करने का सबसे शक्तिशाली साधन है।

त्याग सिर्फ भौतिक वस्तुओं का नहीं होता, बल्कि यह अपनी इच्छाओं, अहंकार और आसक्तियों का भी होता है। जब हम बिना किसी प्रत्युपकार (Return) की अपेक्षा के अपने पास उपलब्ध संपदा, ज्ञान और समय को दूसरों के उत्थान और कल्याण के लिए लगाते हैं, तो यही सच्चा उत्तम त्याग है। श्रावकों (गृहस्थ) द्वारा दिए जाने वाले आहार, अभय, औषधि और ज्ञान दान भी इसी त्याग की भावना के प्रतीक हैं।

उत्तम त्याग: व्यक्तिगत, सामाजिक और विश्व कल्याण का आधार

उत्तम त्याग का पालन केवल आत्म-विकास के लिए ही नहीं, बल्कि समाज और विश्व के लिए भी अत्यंत लाभकारी है:

  • व्यक्तिगत कल्याण: त्याग हमें मानसिक और आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है। जब हम वस्तुओं और इच्छाओं के मोह से ऊपर उठते हैं, तो हमें सच्चा सुख और संतोष मिलता है। यह हमें जीवन की क्षणिक सुख-सुविधाओं से ऊपर उठाकर आत्म-ज्ञान की ओर बढ़ता है। मोक्ष मार्ग पर चलने के लिए त्याग एक आवश्यक शर्त है।

  • सामाजिक समरसता: जब समाज के लोग त्याग की भावना को अपनाते हैं, तो वे दूसरों की मदद के लिए आगे आते हैं। इससे सामाजिक असमानता कम होती है, और एक दूसरे के प्रति सहयोग और सद्भावना का माहौल बनता है। त्याग की भावना से ही निस्वार्थ सेवा, दान और परोपकार जैसे सद्गुण समाज में पनपते हैं।

  • विश्व कल्याण और स्थिरता: आज विश्व में जो भी पर्यावरणीय समस्याएं, आर्थिक असमानता और संघर्ष हैं, उनका एक बड़ा कारण मनुष्य का संग्रह करने का लालच और अति उपभोग है। जब हम अपनी आवश्यकताओं को सीमित करते हैं और दूसरों के साथ साझा करते हैं, तो प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कम होता है। त्याग हमें यह सिखाता है कि हम सब एक हैं और हमें मिलकर इस दुनिया को एक बेहतर जगह बनाना है, न कि उसे अपनी लालच के लिए बर्बाद करना है।

उत्तम त्याग की साधना का वैज्ञानिक पहलू

मनोवैज्ञानिक रूप से भी, दान और त्याग हमें खुशी और संतोष का अनुभव कराते हैं। यह हमारे दिमाग में सकारात्मक हार्मोन (जैसे सेरोटोनिन) के स्तर को बढ़ाता है और हमें दूसरों के साथ सामंजस्य बनाने में मदद करता है। निस्वार्थ सेवा और त्याग हमें जीवन में एक उद्देश्य की भावना देते हैं।

पर्युषण पर्व के आठवें दिन की पूजन विधि और महत्व

आज के दिन की पूजा, स्वाध्याय और जाप विधि हमें उत्तम त्याग के सार को समझने में मदद करती है:

  • देव, शास्त्र, गुरु/पंचपरमेष्ठी/नवदेवता पूजन: हम उन महान आत्माओं की पूजा करते हैं जिन्होंने पूर्ण त्याग का पालन कर मोक्ष प्राप्त किया।

  • चौबीसी पूजन (24 तीर्थंकर): तीर्थंकरों ने अपने जीवन में चरम त्याग का पालन किया। उनकी पूजा हमें प्रेरणा देती है।

  • मूलनायक तीर्थंकर पूजन: अपनी श्रद्धा को मूलनायक भगवान के चरणों में समर्पित करें।

  • सोलह कारण पूजन: यह हमें आत्मा की शुद्धि और तीर्थंकर पद के लिए आवश्यक गुणों को समझने में मदद करता है।

  • दसलक्षण पूजा: दसलक्षण धर्मों की पूजा करके इन गुणों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें।

  • स्वयंभू स्तोत्र: पूजन की समाप्ति के पहले, समुच्चय महा अर्घ के पहले, स्वयंभू स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन करें। यह मन को एकाग्र करता है।
  • स्वाध्याय: धर्म ध्यान के लिए स्वाध्याय (शास्त्रों का अध्ययन), विशेष रूप से तत्त्वार्थसूत्र ग्रंथ के सभी 357 सूत्रों का शुद्ध पाठ अवश्य करें और प्रतिदिन एक अध्याय का स्वाध्याय करने से विशेष कर्मों की निर्जरा होती है।

और अंत में, “ॐ ह्रीं उत्तम त्याग धर्मांड़गाय नमः” का जाप, हमें त्याग को सिर्फ एक विचार नहीं, बल्कि एक व्यवहार बनाने की शक्ति देता है।

आइए, इस पावन दिन हम सब मिलकर त्याग को अपने जीवन का आधार बनाएं और इस तरह व्यक्तिगत कल्याण के साथ-साथ समाज और विश्व कल्याण में भी अपना योगदान दें।

सुदीप कुमार जैन

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