जय जिनेंद्र। संत शिरोमणि आचार्य गुरुवर 108 श्री विद्यासागर जी महामुनिराज का जीवन केवल एक जैन संत की यात्रा नहीं, बल्कि एक राष्ट्र संत का वह आध्यात्मिक रूप से समृद्ध युग था, जो ज्ञान, करुणा और सेवा की त्रिवेणी से सुशोभित था। उनका जीवन भगवान महावीर के आदर्शों का साक्षात प्रतीक था, एक ऐसा प्रकाश स्तंभ जिसने अनगिनत आत्माओं को आत्म-कल्याण के मार्ग पर प्रेरित किया। यह विस्तृत आलेख उस महामानव की जीवन गाथा को समर्पित है, जिन्होंने अपने त्याग और तपस्या से मानवता के उत्थान का एक नया अध्याय लिखा।

भाग 1: विद्याधर से विद्यासागर तक – एक आध्यात्मिक सूर्य का उदय
1.1 सदलगा में दिव्य बचपन का अवतरण
कर्नाटक के बेलगाम जिले के सदलगा ग्राम में, एक धर्मनिष्ठ कन्नड़ भाषी जैन परिवार में, आश्विन शुक्ल पूर्णिमा (शरद पूर्णिमा), संवत २००३, तद्नुसार १० अक्टूबर १९४६ की मध्यरात्रि को एक दिव्य बालक का जन्म हुआ । पिता श्री मल्लप्पा जी अष्टगे और माता श्रीमती जी अष्टगे के घर जन्मे इस बालक का नाम विद्याधर रखा गया । वे अष्टगे गोत्र के थे। वे अपने चार भाइयों में दूसरे थे; बड़े भाई महावीर और छोटे भाई अनंतनाथ व शांतिनाथ थे, साथ ही दो बहनें भी थीं । उनका बचपन से ही धर्म के प्रति गहरा झुकाव था। वे अक्सर मंदिरों में जाते और अपने छोटे भाई-बहनों को धर्म के सिद्धांत सिखाते थे । उनका स्वभाव अत्यंत सरल और संतोषी था; जो कुछ भी उन्हें दिया जाता, वे उसे सहजता से स्वीकार कर लेते । उनका परिवार धन धान्य से सम्पन्न था। आपके पिता अत्यंत कर्मठ और ईमानदार कृषक थे। आपको धार्मिक संस्कार अपने माता पिता से प्राप्त हुए।
1.2 शिक्षा: लौकिक और आध्यात्मिक
विद्याधर ने अपनी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा अपनी मातृभाषा कन्नड़ और मराठी माध्यम से नौवीं कक्षा तक प्राप्त की । हालाँकि, उनकी सच्ची प्यास आध्यात्मिक ज्ञान के लिए थी। उन्होंने जैन दर्शन, न्याय, व्याकरण और अध्यात्म की गहराइयों में उतरने का निश्चय किया। उनकी बहुभाषी प्रतिभा असाधारण थी; वे कन्नड़, मराठी, हिंदी के साथ-साथ संस्कृत और प्राकृत जैसी प्राचीन भाषाओं में भी विशेषज्ञ स्तर का ज्ञान रखते थे । यह भाषाई निपुणता केवल एक अकादमिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि यह उनके भविष्य के धर्म-प्रचार (धर्म प्रभावना) का एक शक्तिशाली उपकरण बनी। इसी क्षमता के बल पर वे कर्नाटक की अपनी जड़ों से लेकर हिंदी भाषी बुंदेलखंड के हृदय क्षेत्र तक, विविध समुदायों के साथ गहराई से जुड़ सके और वहां एक अभूतपूर्व धार्मिक और शैक्षिक पुनर्जागरण का नेतृत्व किया । उन्होंने लौकिक शिक्षा को अस्वीकार नहीं किया, बल्कि उसे पार कर यह सिद्ध किया कि सच्चा ज्ञान (सम्यक् ज्ञान) केवल सूचनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभूति है।
1.3 वैराग्य की पुकार: अजमेर में दीक्षा
मात्र 22 वर्ष की आयु में, विद्याधर ने संसार के सभी बंधनों को त्यागकर आत्म-कल्याण के मार्ग पर चलने का दृढ़ संकल्प लिया । वे राजस्थान के अजमेर पहुँचे, जहाँ उन्होंने अपना जीवन परम पूज्य आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज को समर्पित कर दिया, जो बीसवीं सदी के महान दिगंबर संत आचार्य शांतिसागर जी महाराज की गौरवशाली परंपरा से थे । ३० जून १९६८ को, आषाढ़ शुक्ल पंचमी, वि.सं. २०२५ के ऐतिहासिक दिन, आचार्य ज्ञानसागर जी ने उन्हें दिगंबर मुनि दीक्षा प्रदान की । उस क्षण विद्याधर का अस्तित्व समाप्त हो गया और मुनि श्री 108 विद्यासागर का जन्म हुआ। यह उनके जीवन का वह निर्णायक मोड़ था, जहाँ से उन्होंने अपने गुरु के चरणों में रहकर ज्ञान और तप की गहन साधना का आरंभ किया।
| घटना | तिथि | स्थान | आयु |
| जन्म | १० अक्टूबर १९४६ (आश्विन शुक्ल पूर्णिमा, सं. २००३) | सदलगा, कर्नाटक | – |
| मुनि दीक्षा | ३० जून १९६८ (आषाढ़ शुक्ल पंचमी, सं. २०२५) | अजमेर, राजस्थान | २२ |
| आचार्य पद | २२ नवंबर १९७२ (मार्गशीर्ष कृष्ण द्वितीया, सं. २०२९) | नसीराबाद, राजस्थान | २६ |
| समाधि | १८ फरवरी २०२४ (माघ शुक्ल अष्टमी, सं. २०८०) | डोंगरगढ़, छत्तीसगढ़ | ७७ |
भाग 2: अडिग तपस्वी – सर्वोच्च तपस्या का जीवन
2.1 दिगंबर चर्या की कठोर साधना
आचार्य विद्यासागर जी का जीवन उनकी सबसे शक्तिशाली देशना (उपदेश) थी। भौतिकवाद और इंद्रिय सुख के इस युग में, उनका जीवन एक जीवंत प्रति-आख्यान था। उनकी तपस्या उनकी आध्यात्मिक सत्ता का आधार थी। उन्होंने आजीवन नंगे पैर (विहार) सम्पूर्ण भारत की पदयात्रा की । वे दिन में केवल एक बार अपनी अंजुलि (हाथों) में भोजन और जल ग्रहण करते थे । उन्होंने उन सभी वस्तुओं का त्याग कर दिया था जिन्हें सामान्य जीवन के लिए आवश्यक माना जाता है, जैसे – नमक, चीनी, फल, दूध, दही, घी, तेल और हरी सब्जियाँ । उनकी आहार चर्या में केवल सादी दाल और रोटी की सीमित मात्रा शामिल थी । वे बिना किसी गद्दे या तकिये के लकड़ी के तख्त या फर्श पर सोते थे, जो शरीर पर आत्मा की विजय का प्रतीक था । यह चरम आत्म-अनुशासन आत्म-पीड़ा नहीं, बल्कि आत्मा की शरीर पर सर्वोच्चता का प्रदर्शन था। उनकी इसी कठोर तपस्या ने उनकी वाणी को अमोघ शक्ति प्रदान की। लोग उनके मार्गदर्शन पर इसलिए विश्वास करते थे क्योंकि वे इस संसार से कुछ भी नहीं चाहते थे। उनकी यह निस्पृहता एक आध्यात्मिक चुंबक बन गई, जिसने लाखों लोगों, यहाँ तक कि देश के सर्वोच्च नेताओं को भी उनकी ओर आकर्षित किया।
2.2 आचार्य पद पर आरोहण
२२ नवंबर १९७२ को, नसीराबाद (राजस्थान) में एक अनूठी और ऐतिहासिक घटना घटी। आचार्य विद्यासागर जी के गुरु, आचार्य ज्ञानसागर जी महाराज ने अपनी सल्लेखना से पूर्व, अपने योग्य शिष्य की आध्यात्मिक ऊँचाइयों को पहचानते हुए, उन्हें अपना ‘आचार्य पद’ सौंप दिया । उस समय आचार्य विद्यासागर जी की आयु मात्र २६ वर्ष थी । गुरु-शिष्य परंपरा का यह एक असाधारण उदाहरण था, जहाँ गुरु ने स्वयं अपने शिष्य की असाधारण विद्वता और साधना को प्रणाम करते हुए उसे अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।
भाग 3: ज्ञान की धारा – साहित्यिक और बौद्धिक विरासत
3.1 ‘मूकमाटी’ – मूक आत्मा का महाकाव्य
आचार्य विद्यासागर जी की साहित्यिक प्रतिभा का शिखर उनका हिंदी महाकाव्य ‘मूकमाटी’ (मूक माटी) है । यह कृति केवल एक कविता नहीं, बल्कि एक गहन दार्शनिक ग्रंथ है। इसमें एक मूक मिट्टी (कर्म-बद्ध आत्मा) की यात्रा का रूपक है, जिसे एक कुम्हार (गुरु) अपने चाक (तपस्या) पर घुमाकर और भट्टी (परीषह) में तपाकर एक पवित्र मंगल-कलश (मुक्त आत्मा) में बदल देता है । यह महाकाव्य जैन तत्वमीमांसा के जटिल सिद्धांतों को अत्यंत सरल, काव्यात्मक और सुलभ रूप में प्रस्तुत करता है। इसकी साहित्यिक और दार्शनिक गहराई इतनी है कि इसे कई विश्वविद्यालयों के एम.ए. हिंदी के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है और इसका अंग्रेजी सहित कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है, जो इसकी सार्वभौमिक अपील का प्रमाण है ।
3.2 एक विपुल लेखक और कवि
‘मूकमाटी’ के अतिरिक्त, आचार्यश्री ने साहित्य की विशाल संपदा का सृजन किया। उन्होंने संस्कृत और प्राकृत में अनेक ‘शतक’ (१०० श्लोकों का संग्रह) लिखे, जिनमें निरंजन शतक, भावना शतक, श्रमण शतक और सुनीति शतक प्रमुख हैं । इसके अलावा, उन्होंने लगभग ७०० अप्रकाशित हाइकू कविताओं की भी रचना की, जो विभिन्न साहित्यिक विधाओं पर उनके असाधारण अधिकार को दर्शाती है । उनका साहित्यिक सृजन परंपरा के भीतर नवाचार का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। महाकाव्य और हाइकू जैसी विधाओं का उपयोग करके, उन्होंने शाश्वत आध्यात्मिक शिक्षाओं को आधुनिक दर्शकों के लिए प्रासंगिक और आकर्षक बनाया। वे केवल प्राचीन ग्रंथों के संरक्षक नहीं थे, बल्कि एक सक्रिय निर्माता थे जिन्होंने जैन साहित्य के भंडार का विस्तार किया।
भाग 4: एक करुणामय समाज के निर्माता – सामाजिक और राष्ट्रीय योगदान
4.1 प्रतिभास्थली: शिक्षा में एक क्रांति
आचार्यश्री का मानना था कि सच्ची शिक्षा चरित्र का निर्माण करती है। इसी दृष्टिकोण के साथ, उन्होंने बालिकाओं के लिए आवासीय विद्यालयों की एक श्रृंखला ‘प्रतिभास्थली’ की स्थापना की । यह केवल एक स्कूल नहीं, बल्कि एक गुरुकुल है जहाँ आधुनिक शिक्षा को गहरे नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों (जैन आचार-विचार) के साथ जोड़ा जाता है। उनका उद्देश्य ज्ञानवान, सशक्त और सदाचारी नागरिक तैयार करना था, जो ‘सम्यक् ज्ञान’ का व्यावहारिक कार्यान्वयन था।
4.2 हथकरघा और दयोदय: एक अहिंसक अर्थव्यवस्था का ताना-बाना
आचार्यश्री के सामाजिक प्रकल्प केवल दान नहीं थे, बल्कि एक धार्मिक समाज के लिए एक समग्र दृष्टिकोण के अभिन्न अंग थे। उन्होंने ‘हथकरघा’ (हैंडलूम) को बढ़ावा दिया ताकि आत्मनिर्भरता बढ़े, अहिंसक तरीके से (मशीनी करघों के विपरीत) वस्त्रों का उत्पादन हो और लोगों को शोषण-मुक्त आजीविका मिले । इसी तरह, ‘दयोदय महासंघ’ के माध्यम से उन्होंने १०० से अधिक गौशालाओं का एक विशाल नेटवर्क स्थापित किया, जो बीमार, वृद्ध और परित्यक्त मवेशियों की देखभाल करता है । यह ‘अहिंसा’ और ‘जीव दया’ का सर्वोच्च व्यावहारिक रूप था। ये सभी परियोजनाएँ मिलकर एक “जैन विकास मॉडल” का निर्माण करती हैं जो टिकाऊ, नैतिक और करुणामय है, और जो केवल आर्थिक मेट्रिक्स पर नहीं, बल्कि आध्यात्मिक सिद्धांतों पर आधारित राष्ट्र निर्माण का एक खाका प्रस्तुत करता है।
भाग 5: गुरु की कृपा – त्याग की एक वंश-परंपरा
5.1 एक सम्पूर्ण परिवार त्याग के मार्ग पर
आचार्य विद्यासागर जी के जीवन का सबसे असाधारण और अद्वितीय पहलू उनके पूरे परिवार का वैराग्य के मार्ग पर चलना था । उनकी आध्यात्मिक आभा इतनी प्रबल थी कि उनके माता-पिता, श्री मल्लप्पा जी और श्रीमती जी, ने भी दीक्षा ग्रहण की और क्रमशः मुनि मल्लिसागर जी और आर्यिका समयमति जी बने । इससे भी आगे, उनके तीनों भाइयों – महावीर, अनंतनाथ और शांतिनाथ – ने भी उन्हीं से दीक्षा ली और क्रमशः मुनि उत्कृष्ट सागर जी, मुनि योगसागर जी और मुनि समयसागर जी के रूप में जाने गए । उनकी दोनों बहनों ने भी आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत धारण किया । यह घटना जीवनी से परे आध्यात्मिक इतिहास के दायरे में प्रवेश करती है। यह इस बात का प्रमाण है कि उन्होंने जिस आध्यात्मिक मार्ग का उपदेश दिया, वह इतना आकर्षक और प्रत्यक्ष रूप से आनंदमय था कि उसने सबसे मजबूत सांसारिक बंधनों को भंग कर उन्हें एक आध्यात्मिक संगति में बदल दिया।
5.2 निरंतर बढ़ता संघ
आचार्यश्री ने अपने कर-कमलों से ५०० से अधिक मुनि, आर्यिका, ऐलक और क्षुल्लक दीक्षाएँ प्रदान कीं, जिससे एक विशाल और अनुशासित संघ का निर्माण हुआ । उनका संघ अपनी कठोर तपस्या, कठिन साधना और दृढ़ चर्या के पालन के लिए जाना जाता है । मुनि सुधासागर जी, मुनि प्रमाणसागर जी जैसे उनके कई शिष्य आज जैन समाज का मार्गदर्शन कर रहे हैं । अपनी समाधि से पूर्व, उन्होंने अपने संघ का दायित्व अपने सहोदर और वरिष्ठ शिष्य, निर्यापक श्रमण मुनि श्री समयसागर जी महाराज को सौंप दिया, जो उनकी दूरदर्शिता का परिचायक है ।
भाग 6: राष्ट्र संत की अंतिम यात्रा
6.1 राष्ट्र के लिए एक प्रकाश स्तंभ
आचार्य विद्यासागर जी को केवल जैन समाज ही नहीं, बल्कि पूरा राष्ट्र ‘राष्ट्र संत’ के रूप में सम्मान देता था। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी तक, देश के अनगिनत नेताओं ने समय-समय पर उनके दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया । विभिन्न केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और यहाँ तक कि विदेशी राजनयिक भी उनसे मार्गदर्शन लेने आते थे और उनकी प्रज्ञा से प्रभावित होते थे । मध्य प्रदेश विधानसभा में उनका विशेष प्रवचन एक ऐतिहासिक घटना थी । उन्होंने हिंदी भाषा को बढ़ावा देने और भारतीय मूल्यों को स्थापित करने के लिए नेताओं को प्रेरित किया ।
6.2 चंद्रगिरि में महासमाधि
अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में, आचार्यश्री छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ स्थित चंद्रगिरि तीर्थ पर विराजमान थे। जब उन्होंने महसूस किया कि शरीर अब आत्म-साधना में सहयोगी नहीं रहा, तो उन्होंने जैन धर्म की सर्वोच्च साधना ‘सल्लेखना’ का संकल्प लिया । उन्होंने तीन दिनों तक पूर्ण उपवास करते हुए अन्न-जल का त्याग कर दिया और निरंतर आत्म-चिंतन में लीन रहे । यह स्वेच्छा से मृत्यु का वरण नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शुद्धि के लिए एक स्वैच्छिक, जागरूक और परम विजय का कार्य था। १८ फरवरी २०२४ को, माघ शुक्ल अष्टमी की मध्यरात्रि में २:३५ बजे, उन्होंने पूर्ण चेतना के साथ अपनी नश्वर देह का त्याग किया और समाधि में लीन हो गए ।
6.3 शोक में राष्ट्र, एक विरासत का उत्सव
आचार्यश्री के समाधि लेने की खबर से पूरा देश शोक में डूब गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे एक “व्यक्तिगत क्षति” और एक “अपूरणीय शून्य” बताते हुए अत्यंत भावुक श्रद्धांजलि अर्पित की । गृह मंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित देश के सभी प्रमुख नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि दी । देश के सभी प्रमुख समाचार पत्रों और मीडिया चैनलों ने उनके जीवन और कार्यों पर विस्तृत लेख प्रकाशित किए। मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ सरकार ने उनके सम्मान में आधे दिन का राजकीय शोक घोषित किया, जो एक दिगंबर संत के लिए एक अभूतपूर्व सम्मान था । यह राष्ट्रव्यापी श्रद्धांजलि इस बात का प्रमाण थी कि आचार्य विद्यासागर जी को केवल जैन समुदाय के नेता के रूप में नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र के आध्यात्मिक पिता के रूप में देखा जाता था।
निष्कर्ष: ज्ञान का शाश्वत प्रकाश
संत शिरोमणि आचार्य विद्यासागर जी महामुनिराज का भौतिक शरीर भले ही हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी विरासत शाश्वत है। उनका जीवन त्याग, तपस्या और आत्म-संयम की एक जीवंत पाठशाला था। अहिंसा, आत्मनिर्भरता, करुणा और शिक्षा पर उनकी शिक्षाएँ आज के युग में पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हैं। उन्होंने हमें दिखाया कि कैसे एक व्यक्ति आध्यात्मिक शक्ति के माध्यम से पूरे समाज और राष्ट्र में सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है। उनका जीवन एक प्रेरणा है, एक आह्वान है – शोक का नहीं, बल्कि उनके द्वारा दिखाए गए आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण के मार्ग पर चलने का। वे ज्ञान के उस शाश्वत प्रकाश के रूप में सदैव हमारे हृदयों में जीवित रहेंगे, जो हमें अनंत काल तक प्रेरित करता रहेगा।