प्रस्तावना: शाश्वत ज्ञान एवं निर्वाण का आलोक

दीपावली, जिसे सामान्यतः प्रकाश के पर्व के रूप में जाना जाता है, जैन परंपरा में एक अत्यंत गहन और विशिष्ट आध्यात्मिक अर्थ धारण करती है। यह बाह्य अंधकार पर बाह्य प्रकाश की विजय का उत्सव मात्र नहीं है, अपितु यह आत्मा के भीतर व्याप्त अज्ञान और कर्म के अंधकार पर सम्यक् ज्ञान के आंतरिक प्रकाश की विजय का महापर्व है।

आचार्य पूज्यपाद स्वामी द्वारा रचित ‘निर्वाण भक्ति’ में मोक्ष कल्याणक की भक्ति का जो गहन चित्रण किया गया है, वह जैन धर्म में दीपावली के पर्व के वास्तविक मर्म को समझने की कुंजी है। यह पर्व, जिसे जैन परंपरा में ‘वीर निर्वाणोत्सव’ के रूप में जाना जाता है, किसी सांसारिक उत्सव या भौतिक अंधकार पर प्रकाश की क्षणिक विजय का प्रतीक नहीं है। अपितु, यह आत्मा के भीतर अनादि काल से व्याप्त अज्ञान, मोह और कर्मों के सघन अंधकार पर केवलज्ञान (सर्वज्ञता) और निर्वाण (मुक्ति) के शाश्वत प्रकाश की परम विजय का उत्सव है। यह उस अंतिम लक्ष्य का स्मरण है, जिसके लिए तीर्थंकरों ने अनंत भवों तक अथक पुरुषार्थ किया।

यह गहन शोध-आधारित लेख इसी दार्शनिक आधार पर खड़ा है। यह भगवान महावीर के निर्वाण की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक घटना, उनके प्रथम गणधर गौतम स्वामी के केवलज्ञान की प्राप्ति, इस परंपरा के पुरातात्विक और शास्त्रीय साक्ष्यों, इसके गूढ़ दार्शनिक अर्थों और इसकी अनूठी पारंपरिक प्रथाओं का एक समग्र विश्लेषण प्रस्तुत करेगा। यह लेख यह स्पष्ट करेगा कि जैन दीपावली क्यों और कैसे अन्य परंपराओं से भिन्न है और इसका मूल संदेश आत्म-दीपक को प्रज्वलित करने का है।

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अध्याय 1: वह अंतिम प्रहर – भगवान महावीर का निर्वाण

पावापुरी का अंतिम उपदेश और ‘धन्य तेरस’

भगवान महावीर के निर्वाण की घटना उनके केवली जीवन के तीस वर्षों की देशना का चरमोत्कर्ष थी। जैन आगमों के अनुसार, अपने जीवन के अंतिम क्षणों में, उन्होंने बिहार स्थित पावापुरी के मनोहर उद्यान में अपना अंतिम उपदेश दिया। कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन, अपना अंतिम उपदेश देने के पश्चात्, भगवान महावीर ने मोक्ष की अंतिम तैयारी के रूप में ‘योग निरोध’ धारण किया। यह मन, वचन और काया की समस्त क्रियाओं का पूर्ण विराम था, जिसके माध्यम से वे तीसरे शुक्ल ध्यान से चौथे, परम शुक्ल ध्यान में प्रवेश करने की प्रक्रिया में उद्यत हुए। चूँकि यह त्रयोदशी का दिन भगवान की अंतिम दिव्य वाणी से ‘धन्य’ हुआ और उनके अंतिम ‘ध्यान’ का साक्षी बना, इसलिए जैन परंपरा में इसे ‘धन्य तेरस’ या ‘ध्यान तेरस’ के नाम से जाना जाता है। यह संभावना है कि कालान्तर में यही ‘धन्य तेरस’ लोकभाषा में ‘धनतेरस’ के रूप में प्रचलित हो गई।

निर्वाण का सटीक काल-निर्धारण

जैन परंपरा की एक विशिष्टता उसका सूक्ष्म काल-गणना और खगोलीय घटनाओं के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। भगवान महावीर के निर्वाण का समय किसी पौराणिक अस्पष्टता में नहीं, बल्कि अत्यंत सटीकता के साथ दर्ज किया गया है। दिगंबर एवं श्वेतांबर दोनों परंपराओं के ग्रंथ, विशेष रूप से ‘तिलोयपण्णत्ति’ जैसे आगम ग्रंथ, इस पर एकमत हैं कि यह घटना कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के अंतिम प्रहर (प्रत्युष काल या उषाकाल) और अमावस्या तिथि के प्रारंभ होने के संधिकाल में घटित हुई। उस समय आकाश में स्वाति नक्षत्र का योग था।

यह काल-निर्धारण केवल एक विवरण मात्र नहीं है; यह इस घटना को एक ऐतिहासिक सत्य के रूप में स्थापित करने का एक सचेत प्रयास है। जब अन्य परंपराओं में महत्वपूर्ण घटनाएं अक्सर सामान्यीकृत समय-सीमा में वर्णित होती हैं, तब जैन ग्रंथों का यह सटीक खगोलीय और पंचांगीय अंकन इस बात का प्रमाण है कि परंपरा ने इस घटना को एक तथ्यात्मक, सत्यापन योग्य ऐतिहासिक क्षण के रूप में संरक्षित करने का प्रयास किया। यह वीर निर्वाणोत्सव को केवल एक स्मरणोत्सव से आगे बढ़ाकर एक ऐतिहासिक घटना की वर्षगाँठ के रूप में स्थापित करता है, जो इसे अद्वितीय प्रामाणिकता प्रदान करता है।

निर्वाण का दार्शनिक अर्थ

जैन दर्शन में ‘निर्वाण’ या ‘मोक्ष’ का अर्थ केवल दैहिक मृत्यु नहीं है। यह एक अत्यंत गहन आध्यात्मिक अवस्था है। यह आत्मा के सभी कर्मों से पूर्णतः मुक्त हो जाने की स्थिति है। कर्मों को दो मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है:

  1. घातिया कर्म: ये चार कर्म आत्मा के स्वाभाविक गुणों (ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य) को घातते हैं या ढकते हैं। इनमें ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, मोहनीय और अंतराय कर्म शामिल हैं। भगवान महावीर ने केवलज्ञान की प्राप्ति के समय ही इन चार कर्मों का नाश कर दिया था।

  2. अघातिया कर्म: ये चार कर्म आत्मा के गुणों को सीधे तौर पर नहीं घातते, बल्कि शरीर, आयु और सांसारिक स्थिति से संबंधित होते हैं। इनमें वेदनीय, आयु, नाम और गोत्र कर्म शामिल हैं।

निर्वाण वह क्षण है जब आत्मा इन शेष चार अघातिया कर्मों का भी पूर्णतः क्षय कर देती है और भौतिक शरीर के बंधन से हमेशा के लिए मुक्त हो जाती है। यह आत्मा का अपने शुद्ध, स्वाभाविक और अनंत स्वरूप—अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत वीर्य—में सदा के लिए स्थापित हो जाना है। यह पुनर्जन्म के चक्र का अंत और परम सिद्धि की अवस्था है।

अध्याय 2: ज्ञान की अखंड श्रृंखला – गौतम गणधर की केवलज्ञान-प्राप्ति

गुरु-शिष्य का अद्भुत संबंध और अंतिम बाधा

भगवान महावीर और उनके प्रथम गणधर, इंद्रभूति गौतम का संबंध जैन इतिहास में अद्वितीय है। गौतम स्वामी प्रकांड विद्वान और ६३ ऋद्धियों के धारक थे, जो उन्हें लगभग सर्वज्ञ के समान ही शक्तियां प्रदान करती थीं। वे गणधर के उत्कृष्ट पद पर आसीन थे। इसके बावजूद, अपने गुरु भगवान महावीर के प्रति उनका स्नेह और सूक्ष्म अनुराग था और यही अनुराग उनके मोहनीय कर्म के आवरण को क्षय होने से रोक रहा था। यह प्रसंग वीतरागता के उच्चतम आदर्श को दर्शाता है, जहाँ मोक्ष के लिए लेशमात्र भी राग—चाहे वह गुरु के प्रति ही क्यों न हो—एक अवरोध होता है।

केवलज्ञान-प्राप्ति और ‘अनुबद्ध केवली’ सिद्धांत

कार्तिक कृष्ण अमावस्या के प्रातः काल या संधिकाल में, भगवान महावीर ने निर्वाण प्राप्त किया, तब गौतम गणधर भी आत्म बोधित होकर शुक्ल ध्यान में आरूढ़ हुए और मोह के नाश होते ही, उन्हें उसी दिन (कार्तिक कृष्ण अमावस्या) को गोधूलि बेला (संध्या काल) में केवलज्ञान की प्राप्ति हुई ।

यह घटना ‘अनुबद्ध केवली’ के सिद्धांत को भी चरितार्थ करती है। ‘अनुबद्ध केवली’ वे होते हैं जो किसी तीर्थंकर या पूर्ववर्ती केवली के मोक्ष जाने के पश्चात् ज्ञान की श्रृंखला को अखंडित बनाए रखते हैं। दिगंबर परंपरा में, भगवान महावीर के प्रातःकाल निर्वाण प्राप्त करने और गौतम स्वामी को उसी दिन संध्याकाल में केवलज्ञान प्राप्त होने के बीच के समय अंतराल को ‘अनुबद्ध केवली’ की परंपरा के अंतर्गत व्यावहारिक रूप से स्वीकार्य माना जाता है, क्योंकि इससे ज्ञान की श्रृंखला उसी दिन अक्षुण्ण बनी रही।

यह घटनाक्रम प्रतीकों से भरा है। भगवान महावीर रूपी ज्ञान के सूर्य के अस्त होते ही, गौतम स्वामी रूपी ज्ञान-दीप का प्रज्वलित हो जाना यह सुनिश्चित करता है कि यह जगत कभी भी सर्वज्ञ ज्ञान के प्रकाश से वंचित न हो। यह गुरु-शिष्य परंपरा की निरंतरता और ज्ञान की निरंतरता का सबसे बड़ा प्रमाण है।

घटनासमय / अवधितिथि (चंद्र दिवस)नक्षत्रआध्यात्मिक महत्व
भगवान महावीर का अंतिम उपदेशकार्तिक कृष्ण त्रयोदशीदिव्य शिक्षाओं का सार और समापन।
योग निरोध (ध्यान तेरस/धन्य तेरस)कार्तिक कृष्ण त्रयोदशीमन, वचन, काय की क्रियाओं का निरोध; गहन शुक्ल ध्यान में प्रवेश।
भगवान महावीर का निर्वाणप्रत्युष काल (उषाकाल)चतुर्दशी और अमावस्या का संधिकालस्वातिमोक्ष की प्राप्ति; दिव्य निर्वाण कल्याणक महा महोत्सव 
गौतम गणधर का केवलज्ञानगोधूलि बेलाकार्तिक कृष्ण अमावस्यासर्वज्ञ ज्ञान की परंपरा की अखंडता सुनिश्चित होना।
वीर निर्वाण संवत् का प्रारंभसूर्योदयकार्तिक शुक्ल प्रतिपदामहावीर की शिक्षाओं द्वारा निर्देशित नए युग का आरंभ।

अध्याय 3: इतिहास के शिलालेख – पुरातात्विक एवं शास्त्रीय साक्ष्य

जैन दीपावली का उत्सव केवल आस्था या पौराणिक कथाओं पर आधारित नहीं है, बल्कि इसके पीछे ठोस ऐतिहासिक, पुरातात्विक और साहित्यिक साक्ष्य हैं जो इसकी प्राचीनता और प्रामाणिकता को सिद्ध करते हैं।

वीर निर्वाण संवत्: एक जीवंत ऐतिहासिक गणना

वीर निर्वाण संवत् विश्व के उन प्राचीनतम संवतों में से एक है जो आज भी निरंतर उपयोग में है। इसकी शुरुआत भगवान महावीर के निर्वाण (527 ईसा पूर्व) से मानी जाती है। यह विक्रम संवत्, शक संवत् और ईस्वी सन् से भी अधिक प्राचीन है, जो जैन परंपरा की गहरी ऐतिहासिक जड़ों को दर्शाता है। यह केवल एक पंचांग नहीं, बल्कि एक जीवंत ऐतिहासिक गणना है जो हर वर्ष जैन समुदाय को उनके अंतिम तीर्थंकर के ऐतिहासिक अस्तित्व का स्मरण कराती है।

बड़ली का शिलालेख: एक पुरातात्विक स्तंभ

इस ऐतिहासिक गणना का सबसे प्रबल भौतिक प्रमाण राजस्थान के अजमेर जिले के पास बड़ली गांव से प्राप्त शिलालेख है। प्रसिद्ध इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा द्वारा खोजा गया यह शिलालेख 443 ईसा पूर्व का है, जो इसे सम्राट अशोक के शिलालेखों से भी प्राचीन बनाता है। इस शिलालेख का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इस पर ब्राह्मी लिपि में “वीर (निर्वाण) संवत् 84” का स्पष्ट अंकन है।

यह पुरातात्विक साक्ष्य असाधारण रूप से महत्वपूर्ण है। यह भगवान महावीर के निर्वाण की तिथि को केवल साहित्यिक परंपरा के दायरे से निकालकर एक ठोस, भौतिक वास्तविकता के धरातल पर स्थापित करता है। यह सिद्ध करता है कि भगवान महावीर के निर्वाण के मात्र 84 वर्षों के भीतर उनके नाम पर स्थापित एक संवत् न केवल प्रचलन में था, बल्कि आधिकारिक रूप से शिलालेखों पर अंकित किया जा रहा था। यह जैन कालक्रम की ऐतिहासिकता का एक अकाट्य प्रमाण है।

‘दीपलिक’ का साहित्यिक साक्ष्य: हरिवंश पुराण

पुरातात्विक साक्ष्य के साथ-साथ, दीपावली मनाने की परंपरा का एक मजबूत साहित्यिक प्रमाण भी मौजूद है। आचार्य जिनसेन द्वारा 783 ई. में रचित ‘हरिवंश पुराण’ में ‘दीपलिक’ उत्सव का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इसमें कहा गया है:

ततस्तुःलोकःप्रतिवर्षमादरत्प्रसिद्धदीपलिकयात्रभारते∣

समुद्यतःपूजयितुंजिनेश्वरंजिनेन्द्र−निर्वाणविभूति−भक्तिभाक्∣

इसका हिंदी अनुवाद है: “देवताओं ने इस अवसर पर दीपक द्वारा पावानगरी (पावापुरी) को प्रबुद्ध किया। उस समय के बाद से, भारत के लोग जिनेन्द्र (भगवान महावीर) के निर्वाणोत्सव पर उनकी पूजा करने के लिए प्रसिद्ध त्यौहार ‘दीपलिक’ मनाते हैं।”

यह श्लोक स्पष्ट रूप से दीपक जलाने की प्रथा को भगवान महावीर के निर्वाण से जोड़ता है। बड़ली का शिलालेख और हरिवंश पुराण का यह उल्लेख मिलकर एक शक्तिशाली ऐतिहासिक प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। एक भौतिक साक्ष्य है जो घटना के बाद एक शताब्दी से भी कम समय का है, और दूसरा एक शास्त्रीय साहित्यिक साक्ष्य है जो उस घटना के उपलक्ष्य में मनाए जाने वाले उत्सव का नाम और स्वरूप बताता है। यह सिद्ध करता है कि जैन दीपावली किसी अन्य पर्व का रूपांतरण नहीं है, बल्कि इसकी अपनी स्वतंत्र, ऐतिहासिक और शास्त्रीय रूप से सत्यापन योग्य जड़ें हैं जो सीधे भगवान महावीर के जीवन से जुड़ी हैं।

अध्याय 4: प्रकाश का दर्शन – दीपावली का आध्यात्मिक मर्म

जैन दीपावली का सच्चा सौंदर्य उसके बाहरी स्वरूप में नहीं, बल्कि उसके गहन आध्यात्मिक और दार्शनिक मर्म में निहित है। यह पर्व जैन धर्म के मूल सिद्धांतों—अपरिग्रह, अहिंसा और आत्म-शुद्धि—को प्रतिबिंबित करता है।

मोक्ष लक्ष्मी बनाम धन लक्ष्मी

यह जैन दीपावली और अन्य परंपराओं के बीच सबसे मौलिक अंतरों में से एक है। व्यापक संस्कृति में जहां दीपावली पर धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी की पूजा प्रमुख है, वहीं जैन धर्म ‘लक्ष्मी’ शब्द को एक क्रांतिकारी दार्शनिक पुनर्व्याख्या प्रदान करता है। जैन परंपरा में ‘लक्ष्मी’ का अर्थ भौतिक धन-संपत्ति नहीं, बल्कि ‘निर्वाण’ या ‘मोक्ष लक्ष्मी’ है—अर्थात् आत्मा की परम सिद्धि और शाश्वत सुख की अवस्था। इसी प्रकार, ‘सरस्वती’ का अर्थ केवल विद्या नहीं, बल्कि ‘केवलज्ञान’—अर्थात् पूर्ण और सर्वज्ञ ज्ञान है।

यह पुनर्विन्यास एक अत्यंत परिष्कृत दार्शनिक कदम है। यह सांस्कृतिक रूप से प्रभावशाली प्रतीकों को अस्वीकार करने के बजाय, उन्हें ग्रहण कर ऐसे अर्थों से भर देता है जो जैन धर्म के मूल सिद्धांतों का समर्थन करते हैं। दीपावली पर, जैन अनुयायी भौतिक धन की नहीं, बल्कि आत्मिक संपदा—सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र (जिन्हें ‘रत्नत्रय’ कहा जाता है) की प्राप्ति की कामना करते हैं। यह अपरिग्रह (अनासक्ति) के सिद्धांत का व्यावहारिक अनुष्ठान है, जो अनावश्यक संग्रह को दुखों का कारण मानता है।

दीपक का प्रतीकवाद

जैन दीपावली पर दीपक जलाने की प्रथा का भी एक गहरा प्रतीकात्मक अर्थ है। यह केवल बाहरी अंधकार को दूर करने के लिए नहीं है।

  • अज्ञान के अंधकार का नाश: दीपक का प्रकाश आत्मा के भीतर व्याप्त मिथ्यात्व (यथार्थ की गलत समझ), कषाय (क्रोध, मान, माया, लोभ) और अज्ञान के अंधकार को सम्यक् ज्ञान के प्रकाश से नष्ट करने का प्रतीक है।

  • आत्मा का स्व-प्रकाश: जैन दर्शन के अनुसार, आत्मा का मूल स्वभाव ही ज्ञान और प्रकाश (‘स्वयंज्योति’ या ‘स्वयंप्रकाश’) है। कर्मों के आवरण के कारण यह प्रकाश ढका रहता है। दीपक हमें उस आंतरिक, शाश्वत प्रकाश को जागृत करने और प्रकट करने की प्रेरणा देता है।

त्याग और संयम का पर्व

इन दार्शनिक आधारों के कारण, जैन दीपावली भोग-विलास का नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या और संयम का पर्व है। यह भगवान महावीर के परम त्याग और उनकी शिक्षाओं का गहराई से चिंतन और स्मरण करने का दिन है। इस दिन धार्मिक अनुष्ठान करना,  स्वाध्याय करना और जिनवाणी का श्रवण करना प्रमुख गतिविधियाँ हैं। पटाखे फोड़ना, जिससे असंख्य सूक्ष्म जीवों की हिंसा होती है और पर्यावरण प्रदूषित होता है, जैन धर्म के ‘अहिंसा परमो धर्मः’ के मूल सिद्धांत के सर्वथा विरुद्ध माना जाता है और इससे बचने का स्पष्ट निर्देश दिया जाता है।

अध्याय 5: परंपरा और प्रतीक – निर्वाण लड्डू एवं पूजन विधान

जैन दीपावली के अनुष्ठान और प्रतीक उसके दार्शनिक मर्म को मूर्त रूप देते हैं। इनमें सबसे प्रमुख ‘निर्वाण लड्डू’ है, जो मात्र एक मिष्ठान्न न होकर एक संपूर्ण आध्यात्मिक ग्रंथ के समान है।

निर्वाण लड्डू का गूढ़ रहस्य

निर्वाण लड्डू का प्रत्येक पहलू—उसका आकार, उसकी सामग्री और उसकी निर्माण प्रक्रिया—जैन मोक्षमार्ग का एक गहन प्रतीक है।

  • आकार (गोल/तबलाकार): लड्डू का पारंपरिक गोल आकार आत्मा के अनादि-अनंत स्वरूप का प्रतीक है, जिसका न कोई आदि है और न कोई अंत। कुछ दिगंबर परंपराओं में इसका आकार तबले या मृदंग जैसा बनाया जाता है, जो सिद्ध शिला (लोक के अग्रभाग पर स्थित वह स्थान जहाँ सिद्ध आत्माएं निवास करती हैं) का प्रतीक है।

  • सामग्री (शुद्ध शक्कर): यह लड्डू केवल शुद्ध शक्कर से बनाया जाता है। यह मोक्ष में प्राप्त होने वाले अतींद्रिय, अव्याबाध और विशुद्ध सुख का प्रतीक है। जिस प्रकार इस लड्डू में कोई अन्य वस्तु मिश्रित नहीं होती, उसी प्रकार सिद्धों का सुख कर्म-मैल या इंद्रिय-जनित सुखों से रहित, केवल आत्म-जनित होता है।

  • निर्माण प्रक्रिया: लड्डू बनाने के लिए शुद्ध शक्कर या बूंदी को पहले गर्म घी या पानी में तपना पड़ता है। यह प्रक्रिया आत्मा द्वारा मोक्ष प्राप्ति के लिए किए जाने वाले घोर तप और कर्म-निर्जरा की साधना का प्रतीक है। तपने की इस अग्नि-परीक्षा से गुजरने के बाद ही उसे मीठी चाशनी (मोक्ष का शाश्वत आनंद) में स्थान मिलता है।

इस प्रकार, निर्वाण लड्डू को चढ़ाना केवल एक भेंट नहीं है, बल्कि यह जैन साधक द्वारा मोक्षमार्ग के संपूर्ण दर्शन की प्रतीकात्मक स्वीकृति और उस पर चलने की प्रतिबद्धता की अभिव्यक्ति है।

जैन दीपावली पूजन विधि

जैन पूजन विधि में भौतिक वस्तुओं या धन की पूजा का कोई स्थान नहीं है। यह ज्ञान और ज्ञान के स्रोतों की पूजा है।

  • पूजा विधान: प्रामाणिक जैन पूजन विधि में प्रातःकाल मंदिरों में भगवान महावीर का अभिषेक और अष्टद्रव्य (जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप, फल) से पूजा की जाती है। इसके बाद ‘निर्वाण कांड’ का पाठ करते हुए निर्वाण लड्डू चढ़ाया जाता है।
  • ज्ञान की पूजा: दीपावली के दिन मुख्य रूप से जिनवाणी (आगम ग्रंथ या शास्त्र) की पूजा की जाती है, क्योंकि वही सम्यक् ज्ञान का स्रोत है और मोक्ष का मार्ग दिखाती है ।

  • दीपावली गृह पूजा: दोपहर के बाद और गौधूलि के पहले घर पर भगवान महावीर और मुख्यतः गौतम स्वामी की ६४ ज्योति के साथ पूजा की जाती है, जो गौतम स्वामी द्वारा गौ – धूलि की बेला में प्राप्त किये गए केवल ज्ञान और ६४ ऋद्धियों का प्रतीक हैं। श्रावक अपने घरों में १६ घी के दीपक में चार-चार बाती इस प्रकार ६४ ज्योति  के साथ जिन पूजा करते हैं, और केवल ज्ञान की प्राप्ति की मंगल कामना करते हुए विश्व में सम्यक ज्ञान का प्रकाश हो और अज्ञानता के अंधकार का नाश हो ऐसी भावना भाते हैं।  

  • बही-खाता एवं व्यवसायिक अनुष्ठान: इस अनुष्ठान में, पूजा के बाद बचे हुए पुष्पों अर्थात् पवित्र पीले चावल को लिया जाता है। इन पुष्पों  को ‘मंगलाष्टक’ स्तोत्र का पाठ करते हुए अपने बहीखातों (लेखा-जोखा बहियों), दुकानों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों, वाहनों और घरों पर क्षेपण (छिड़काव) किया जाता है। यह क्रिया एक गहन भावना के साथ की जाती है, जिसे ‘ज्ञान भक्ति और प्रचार की भावना’ कहा गया है। सतही तौर पर यह अनुष्ठान व्यावसायिक समृद्धि के लिए एक सामान्य मांगलिक क्रिया प्रतीत हो सकता है, जैसा कि कई अन्य संस्कृतियों में प्रचलित है। हालांकि, इसका आंतरिक अर्थ कहीं अधिक गहरा है। यह केवल भौतिक लाभ या सौभाग्य की प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह स्वयं ‘वाणिज्य को पवित्र करने’ का एक संकल्प है। जब ज्ञान-पूजा के बाद पवित्र पीले अक्षत या पुष्पों को बहीखाते पर छिड़का जाता है, तो यह इस बात का प्रतीक है कि भक्त अपने वित्तीय लेन-देन को ‘सम्यक् ज्ञान’ के शासन के अधीन रख रहा है।

अध्याय 6: एक नए युग का सूत्रपात – जैन नव वर्ष का आरंभ

जैन नव वर्ष दीपावली के अगले दिन, कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होता है। इसका समय-निर्धारण एक गहरे दार्शनिक सत्य को प्रकट करता है।

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा का महत्व

भगवान महावीर के निर्वाण के अगले दिन से नए वर्ष का आरंभ यह दर्शाता है कि जैन धर्म में अधिकार का स्रोत व्यक्ति नहीं, बल्कि उसके द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत हैं।

  • शासन का नवीन प्रारंभ: भगवान महावीर की भौतिक उपस्थिति (देह) का अंत उनके शासन (उनकी शिक्षाओं के युग) का वास्तविक प्रारंभ है। नया वर्ष किसी व्यक्ति के चले जाने का शोक मनाने के लिए नहीं, बल्कि उनके द्वारा दिए गए शाश्वत मार्ग के आलोक में एक नए युग के आरंभ का उत्सव मनाने के लिए है। जब तक तीर्थंकर स्वयं उपस्थित थे, वे ज्ञान के प्रत्यक्ष स्रोत थे। उनके निर्वाण के साथ ही, उनके द्वारा कही गई वाणी (आगम) समुदाय के लिए सर्वोच्च मार्गदर्शक बन गई। यह व्यक्ति-केंद्रित अधिकार से सिद्धांत-केंद्रित अधिकार की ओर एक महत्वपूर्ण संक्रमण है।

  • गणराजाओं का निर्णय: प्रचलित कथा के अनुसार, भगवान महावीर के निर्वाण से जो ज्ञान का दीपक बुझ गया था, उसकी स्मृति में काशी-कोशल के 18 गणराजाओं ने मिलकर दीपक जलाए और यह संकल्प लिया कि अब से हम अपने राज-काज का मार्गदर्शन भौतिक राजा के बजाय महावीर की वाणी से लेंगे। इसी संकल्प के साथ एक नए संवत्, ‘वीर निर्वाण संवत्’ की शुरुआत हुई।

गोवर्धन पूजा का जैन परिप्रेक्ष्य

एक मान्यता के अनुसार, दीपावली के अगले दिन मनाई जाने वाली गोवर्धन पूजा का भी जैन परंपरा से प्रतीकात्मक संबंध है। जैन शास्त्रों में ‘जिनवाणी’ (भगवान की वाणी) को ‘गौ’ (गाय) की उपमा दी गई है। जिस प्रकार गाय अपने दूध से पोषण करती है, उसी प्रकार जिनवाणी ज्ञान-रूपी अमृत से आत्मा का पोषण करती है। भगवान महावीर के निर्वाण के पश्चात्, गौतम गणधर ने कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से ही अपनी दिव्य-ध्वनि द्वारा जिनवाणी का प्रवाह पुनः आरंभ किया। इस प्रकार, ‘गौ’ (जिनवाणी) का ‘वर्धन’ (बढ़ाना, पूजा करना) हुआ। यह व्याख्या गोवर्धन पूजा को एक भौतिक पर्वत या घटना से न जोड़कर, ज्ञान की परंपरा के संवर्धन के एक आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में देखती है।

यह परंपरा दर्शाती है कि सच्चा प्रकाश किसी व्यक्ति की उपस्थिति में नहीं, बल्कि उसके द्वारा दिए गए ज्ञान में निहित है। वीर निर्वाण संवत् आज भी जैन समुदाय के लिए उनकी अद्वितीय ऐतिहासिक और दार्शनिक पहचान का एक जीवंत प्रतीक है।

निष्कर्ष: आत्म-दीपक को प्रज्वलित करने का पर्व

उपरोक्त विस्तृत विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि जैन दीपावली, या वीर निर्वाणोत्सव, एक बहुआयामी पर्व है जो एक ऐतिहासिक घटना (भगवान महावीर का निर्वाण), एक गहन दार्शनिक सिद्धांत (अज्ञान पर ज्ञान की विजय), और एक सतत आध्यात्मिक साधना (आत्म-शुद्धि) का अद्भुत संगम है। यह बड़ली के शिलालेख जैसे पुरातात्विक प्रमाणों और हरिवंश पुराण जैसे शास्त्रीय ग्रंथों द्वारा समर्थित एक ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित उत्सव है।

इसका मूल संदेश भौतिकता से आध्यात्मिकता की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर, और बंधन से मुक्ति की ओर एक गहन यात्रा का है। निर्वाण लड्डू का प्रतीकवाद, मोक्ष लक्ष्मी की अवधारणा, और ज्ञान-केंद्रित पूजन विधि, सभी जैन धर्म के मूल सिद्धांतों को प्रतिध्वनित करते हैं।

अंततः, सच्ची दीपावली बाहर असंख्य दीपक जलाने में उतनी नहीं है, जितनी भगवान महावीर और गौतम गणधर के उदाहरण का अनुसरण करते हुए अपने भीतर ज्ञान, वैराग्य, अहिंसा और समता का दीपक प्रज्वलित करने में है। यह आत्म-साक्षात्कार का पर्व है, जो हमें प्रतिवर्ष स्मरण कराता है कि हमारा अंतिम लक्ष्य कर्मों के अंधकार को मिटाकर आत्मा के स्वाभाविक प्रकाश को प्रकट करना और निर्वाण को प्राप्त करना है। यह बाहर के उत्सव से कहीं अधिक भीतर की साधना का पर्व है।

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