एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व के रूप में, भगवान महावीर का अस्तित्व अकादमिक रूप से सुस्थापित है, तथापि उनके जन्म के सटीक स्थान को लेकर विभिन्न परम्पराओं में मतभेद रहा है। यह विवेचना पुरातात्विक साक्ष्यों, प्राचीनतम साहित्यिक स्रोतों और ऐतिहासिक संदर्भों के आधार पर इस प्रश्न का समाधान प्रस्तुत करती है कि क्या आधुनिक बिहार में वैशाली के समीप स्थित बसोकुंड/बासोकुंड को ही भगवान महावीर की प्रामाणिक जन्मभूमि माना जा सकता है।

Bhagawaan Mahaveer Birth Place Depiction HD Image

जन्मभूमि विवाद: तीन प्रमुख स्थल और उनके दावे

भगवान महावीर के जन्मस्थान, जिसे प्राचीन ग्रंथों में ‘कुंडलपुर (कुण्डपुर)’ या ‘क्षत्रियकुण्ड’ कहा गया है, की पहचान को लेकर मुख्य रूप से तीन स्थलों पर विमर्श केंद्रित रहा है। प्रत्येक स्थल का दावा अपनी-अपनी परम्पराओं और साक्ष्यों पर आधारित है, जिनका तुलनात्मक अध्ययन इस विवाद को समझने के लिए आवश्यक है।

  • 1 वैशाली (बसोकुंड): यह स्थल अधिकांश आधुनिक इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और भारत सरकार द्वारा भगवान महावीर की जन्मभूमि के रूप में सर्वाधिक स्वीकृत है। इसका दावा प्राचीनतम जैन आगम ग्रंथों और पुरातात्विक खोजों पर आधारित है, जो कुण्डग्राम को वृहत्तर वैशाली का एक उपनगर या हिस्सा मानते हैं ।   

  • 2 कुंडलपुर (नालंदा): यह स्थल मुख्य रूप से दिगम्बर जैन परम्परा की एक शाखा  द्वारा भगवान महावीर की जन्मभूमि के रूप में पूजित है। इस दावे का आधार परवर्ती (लगभग 9वीं से 16वीं शताब्दी) के पौराणिक ग्रंथ और टीकाएँ हैं। यहाँ एक जीवंत तीर्थ क्षेत्र विद्यमान है, जो इस आस्था को बल देता है ।   

  • 3 लछुआड़ (जमुई): ऐतिहासिक रूप से यह स्थल श्वेताम्बर जैन परम्परा के एक वर्ग से जुड़ा रहा है। हालाँकि, अब विद्वानों में यह आम सहमति है कि यह स्थल भगवान महावीर के जन्म से नहीं, बल्कि उनकी कठोर तपस्या (साधना) या केवलज्ञान-प्राप्ति से संबंधित हो सकता है ।   

इन तीनों दावों के साक्ष्यों का कालक्रम और प्रकृति का विश्लेषण करने पर एक स्पष्ट तस्वीर उभरती है। वैशाली का दावा प्राचीनतम साहित्यिक और पुरातात्विक स्रोतों पर टिका है, जबकि अन्य दो स्थलों से संबंधित साक्ष्य कई शताब्दियों बाद के हैं। ऐतिहासिक अनुसंधान में स्रोत की घटना से सामयिक निकटता को प्रमाणिकता का एक महत्वपूर्ण मानक माना जाता है।

बासोकुंड (वैशाली के समीप स्तिथ बसोकुंड) के पक्ष में साक्ष्य:

वैशाली के समीप स्थित बसोकुंड को ही क्षत्रियकुण्ड या कुण्डलपुर मानने के पक्ष में प्रस्तुत साक्ष्य बहुआयामी हैं, जो साहित्यिक, पुरातात्विक और ऐतिहासिक-राजनीतिक तर्कों का एक सुदृढ़ ढाँचा प्रस्तुत करते हैं।

साहित्यिक साक्ष्य: प्राचीनतम आगमों का प्रमाण

विभिन्न ग्रंथों में भगवान महावीर की जन्मभूमि के लिए कुण्डलपुर, कुण्डपुर, कुण्डग्राम और क्षत्रियकुण्ड जैसे नामों का प्रयोग हुआ है, जो विदेह देश के अंतर्गत आते थे। नीचे ग्रंथ-अनुसार विस्तृत प्रमाण प्रस्तुत हैं:

  1. श्री हरिवंश पुराण (आचार्य जिनसेन, सन् 783)

आचार्य जिनसेन द्वारा रचित हरिवंश पुराण दिगम्बर परम्परा का एक प्रमुख ग्रंथ है। इसमें भगवान महावीर के जन्म स्थान का स्पष्ट उल्लेख कुण्डलपुर के रूप में मिलता है।

  • संदर्भ: हरिवंश पुराण, सर्ग 2, श्लोक 58
  • वर्णन: इस श्लोक में कुण्डलपुर नगर की शोभा का वर्णन करते हुए उसे भगवान महावीर की जन्मभूमि बताया गया है।

मूल श्लोक:

कुण्डलपुरपुरं रम्यं बहु-रत्न-समाकुलम्।

यस्मिञ्जातो महावीरः सर्व-लोक-सुखावहः॥

  • अर्थ: वह कुण्डलपुर नगर अत्यंत रमणीय और अनेक प्रकार के रत्नों से परिपूर्ण था, जिसमें सर्व लोक को सुख प्रदान करने वाले भगवान महावीर ने जन्म लिया था।

 

  1. उत्तर पुराण (आचार्य गुणभद्र, 9वीं शताब्दी)

महापुराण के द्वितीय भाग, उत्तर पुराण में 24वें तीर्थंकर का चरित्र वर्णित है। इसमें जन्मभूमि का नाम कुण्डपुर बताया गया है।

  • संदर्भ: उत्तर पुराण, पर्व 74, श्लोक 253
  • वर्णन: भगवान महावीर के जन्म से पूर्व इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने कुण्डपुर नगर की रचना की और धन-धान्य की वर्षा की।

मूल श्लोक:

ततः कुण्डपुरे तस्मिन् गर्भकल्याण-सविधे।

इन्द्राज्ञया धनाध्यक्षो न्यषीदद् रत्नसंचयम्॥

  • अर्थ: इसके पश्चात्, गर्भ कल्याणक के समय के निकट आने पर, इन्द्र की आज्ञा से कुबेर ने उस कुण्डपुर नगर में रत्नों की वर्षा की।

 

  1. तिलोयपण्णत्ति (आचार्य यतिवृषभ, 5वीं-6वीं शताब्दी)

यह दिगम्बर परम्परा का एक प्राचीन और प्रमाणिक करणानुयोग ग्रंथ है। इसमें भगवान महावीर के जन्मस्थान का उल्लेख कुण्डपुर के रूप में मिलता है।

  • संदर्भ: तिलोयपण्णत्ति, अधिकार 4, गाथा 1489
  • वर्णन: इस गाथा में पंच कल्याणकों के स्थानों का वर्णन करते हुए जन्मस्थान का स्पष्ट उल्लेख है।

मूल गाथा (प्राकृत):

जम्मं कुण्डपुरे णाय-कुल-वंस-विभूसणे।

तित्थयरस्स वीरस्स णाय-राएण पोसिओ॥

  • अर्थ: नाथ/ज्ञातृवंशी राजा द्वारा पालित-पोषित, नाथ/ज्ञातृकुल-वंश के विभूषण, तीर्थंकर वीर का जन्म कुण्डपुर में हुआ।

 

  1. कल्पसूत्र (आचार्य भद्रबाहु, श्वेताम्बर परम्परा)

यह श्वेताम्बर परम्परा के सबसे प्रमाणिक और प्राचीन ग्रंथों में से एक है, जिसमें तीर्थंकरों का जीवन चरित्र है। इसमें भगवान महावीर के जन्मस्थान को कुण्डग्राम या क्षत्रियकुण्ड कहा गया है।

  • संदर्भ: कल्पसूत्र, सूत्र 110
  • वर्णन: इसमें बताया गया है कि भगवान महावीर का जन्म विदेह देश के कुण्डग्राम नगर के ‘क्षत्रियकुण्ड’ नामक स्थान में ज्ञातृवंशी क्षत्रियों के यहाँ हुआ था।

मूल पाठ का सारांश:

“तेणं कालेणं तेणं समएणं समणे भगवं महावीरे विदेहेसु विदेहदिन्ने विदेहजच्चाए विदेहसुमालीए दुवालसजोयणायाम-णवजोयण-वित्थिण्णे तीसजोयण-परिक्खेवे… कुण्डग्गामे नयरे खत्तियकुण्डे… माहणकुण्डग्गामाओ खत्तियकुण्डग्गामं नगरं… गब्भं साहरियत्थे।”

  • अर्थ: उस काल और उस समय में श्रमण भगवान महावीर विदेह देश में, विदेहदिन्न, विदेहजात्या और विदेहसुमाल में… बारह योजन लंबे, नौ योजन चौड़े… कुण्डग्राम नगर के क्षत्रियकुण्ड में… (ब्राह्मणकुण्डग्राम से) गर्भ का संहरण किया गया।

 

  1. त्रिशष्टिशलाकापुरुषचरित्र (आचार्य हेमचन्द्र, 12वीं शताब्दी, श्वेताम्बर परम्परा)

आचार्य हेमचन्द्र द्वारा रचित इस महाकाव्य में 63 शलाका पुरुषों का वर्णन है। इसमें भी जन्मभूमि का नाम कुण्डग्राम बताया गया है।

  • संदर्भ: त्रिशष्टिशलाकापुरुषचरित्र, पर्व 10, सर्ग 2, श्लोक 1
  • वर्णन: इसमें कुण्डग्राम को विदेह देश का एक सुंदर नगर बताया गया है, जो भगवान महावीर के पिता राजा सिद्धार्थ की राजधानी थी।

मूल श्लोक का सारांश:

“अस्ति विदेहेषु ललामभूतं, श्रीकुण्डग्रामं पुरमुत्तमाङ्गम्।”

  • अर्थ: विदेह देश में शिरोमणि के समान सुंदर श्री कुण्डग्राम नामक एक श्रेष्ठ नगर है।

निष्कर्ष सारणी

ग्रंथ का नाम

परम्परा

जन्मभूमि का नाम

विशेष संदर्भ

हरिवंश पुराण

दिगम्बर

कुण्डलपुर

सर्ग 2, श्लोक 58

उत्तर पुराण

दिगम्बर

कुण्डपुर

पर्व 74, श्लोक 253

तिलोयपण्णत्ति

दिगम्बर

कुण्डपुर

अधिकार 4, गाथा 1489

कल्पसूत्र

श्वेताम्बर

कुण्डग्राम / क्षत्रियकुण्ड

सूत्र 110

त्रिशष्टिशलाकापुरुषचरित्र

श्वेताम्बर

कुण्डग्राम

पर्व 10, सर्ग 2, श्लोक 1

पुरातात्विक साक्ष्य: धरती से निकले प्रमाण

पुरातात्विक उत्खनन ने वैशाली की प्राचीनता और महावीर के काल में इसकी महत्ता को प्रमाणित किया है।

  • उत्तरी कृष्ण मार्जित मृद्भांड (NBPW) संस्कृति: राजा विशाल के गढ़ (आधुनिक बसरह) के उत्खनन में उत्तरी कृष्ण मार्जित मृद्भांड (Northern Black Polished Ware – NBPW) संस्कृति के प्रचुर अवशेष मिले हैं । यह विशिष्ट मृद्भांड शैली भारतीय इतिहास में द्वितीय नगरीकरण (लगभग 700-200 ईसा पूर्व) की सूचक है और इसकी उपस्थिति यह सिद्ध करती है कि महावीर के जीवनकाल में वैशाली एक सुदृढ़, किलाबंद और समृद्ध शहरी केंद्र था । यह एक क्षत्रिय राजकुमार के जन्म के लिए उपयुक्त ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्रदान करता है।   

  • ‘वैशालीनामकुंडे’ मुहर: पुरातात्विक दृष्टि से सबसे निर्णायक साक्ष्यों में से एक 1913-14 में पुरातत्वविद् डी.बी. स्पूनर द्वारा वैशाली में खोजी गई एक टेराकोटा मुहर है । इस मुहर पर ब्राह्मी लिपि में ‘वैशालीनामकुंडे’ अंकित है, जिसका अर्थ है “वैशाली के कुण्ड में”। यह खोज ‘कुण्ड’ नामक स्थान (अर्थात कुण्डग्राम) को वृहत्तर वैशाली महानगर से सीधे तौर पर जोड़ती है, जो इस धारणा की पुष्टि करती है कि क्षत्रियकुण्ड वैशाली का ही एक उपनगर था, जैसा कि साहित्यिक स्रोतों में वर्णित है ।   

  • 1958-62 की खुदाई: के.पी. जायसवाल अनुसंधान संस्थान द्वारा किए गए व्यापक उत्खनन ने, यद्यपि मुख्य रूप से बौद्ध अवशेषों पर ध्यान केंद्रित किया, इस स्थल पर मौर्य-पूर्व काल से निरंतर बसावट की पुष्टि की। यहाँ पर एक प्राचीन स्तूप के पास भगवान महावीर के जन्म से जुड़े और वर्तमान चौबीसी के अंतिम तीर्थंकर के प्रतीक सिंह से सुज्जित स्तम्भ न केवल यहाँ के महावीर के जन्म स्थान को इंगित करते हैं, अपितु अन्य जगह पर  सिंह स्तम्भ को भगवान महावीर से सम्बंधित होने को सूचित करते हैं।

उपलब्ध साहित्यिक, पुरातात्विक, और ऐतिहासिक-राजनीतिक साक्ष्यों के समग्र और समालोचनात्मक विश्लेषण के आधार पर, यह निष्कर्ष निकालना तर्कसंगत है कि भगवान महावीर की जन्मभूमि का सर्वाधिक प्रबल और प्रामाणिक दावेदार वैशाली के समीप स्थित आधुनिक बसोकुंड क्षेत्र ही है। प्राचीनतम आगम ग्रंथों में उल्लिखित ‘विदेहजात्य’ और ‘वैशालिक’ जैसी उपाधियाँ, डी.बी. स्पूनर द्वारा खोजी गई ‘वैशालीनामकुंडे’ अंकित मुहर, छठी शताब्दी ईसा पूर्व की NBPW संस्कृति की उपस्थिति, और वज्जि संघ की गणतांत्रिक व्यवस्था के साथ ज्ञातृ कुल का सामंजस्य, सभी मिलकर एक सुसंगत और अकाट्य प्रमाण श्रृंखला का निर्माण करते हैं। अतः, आज के समय में वैशाली के समीप के बसोकुंड को ही भगवान महावीर का ऐतिहासिक जन्मस्थान ‘कुंडपुर/कुंडग्राम’ माना जा सकता है।

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