'छहढाला' जैन धर्म का एक प्रमुख ग्रंथ है, जिसके पूर्वार्ध में जीव के संसार में भटकने और उसके दुखों के कारणों (अज्ञानता व मिथ्यात्व) का विश्लेषण किया गया है, जबकि उत्तरार्ध में 12 भावनाओं, सात तत्वों और रत्नत्रय के माध्यम से मोक्ष मार्ग का मार्गदर्शन किया गया है।
ग्रन्थ परिचय
'छहढाला' जैन धर्म का एक अत्यंत लोकप्रिय और महत्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसकी रचना पंडित दौलतराम जी ने की है। इस ग्रंथ में कुल छह भाग (ढालें) हैं, जो गागर में सागर की तरह जैन दर्शन को समेटे हुए हैं। इसके शुरुआती भाग में जीव के चार गतियों (देव, मनुष्य, तिर्यंच और नर्क) में भटकने और उसके दुखों के मूल कारण—अज्ञानता, मिथ्या दर्शन, मिथ्या ज्ञान और मिथ्या चारित्र—का गहन विश्लेषण किया गया है। वहीं, ग्रंथ के उत्तरार्ध में दुखों से मुक्ति का मार्ग दिखाया गया है। इसमें 12 भावनाओं के चिंतन, सात तत्वों के सच्चे स्वरूप और मोक्ष मार्ग के आधार रत्नत्रय (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र) को अत्यंत सरल और व्यावहारिक रूप में समझाया गया है, जो आत्मा को कल्याण की ओर अग्रसर करता है।
