जय जिनेन्द्र मित्रों,
क्या आपने कभी बाइसवें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ जी के अद्भुत जीवन और गुजरात के गिरनार पर्वत (उर्जयन्त गिरि) की दुर्गम ऊँचाइयों पर घटित उनकी परम मोक्ष यात्रा के विषय में गहराई से चिंतन किया है? जैन दर्शन में गिरनार मात्र एक पर्वत नहीं है, बल्कि यह वह शाश्वत तीर्थ है जहाँ से असंख्य मुनियों ने निर्वाण प्राप्त किया है। आइए, आज शास्त्रों, इतिहास और पुरातत्व के आलोक में भगवान नेमिनाथ और गिरनार पर्वत के उस अटूट संबंध को समझें, जिसे आज मिटाने या विवादित करने का प्रयास किया जा रहा है।
👑 यदुवंश का गौरव: जन्म और अलौकिक शक्ति
महाभारत कालीन युग में, बाइसवें तीर्थंकर श्री नेमिनाथ जी का जन्म शौर्यपुर (वर्तमान बटेश्वर के निकट) में यदुवंश के राजा समुद्रविजय और महारानी शिवा देवी के घर हुआ था। रिश्ते में वे नारायण श्रीकृष्ण के चचेरे भाई थे।
बचपन से ही उनकी अलौकिक प्रतिभा और आध्यात्मिक आभा पूरे यदुवंश में प्रसिद्ध थी। उनकी शारीरिक और आत्मिक शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण तब मिला, जब एक दिन द्वारिका में उन्होंने श्रीकृष्ण की आयुधशाला में जाकर सहज ही नाग-शय्या पर चढ़कर उसे वश में कर लिया और उस अलौकिक शंख का नाद किया, जिसे उठा पाना भी किसी सामान्य मनुष्य के वश में नहीं था। इस भीषण शंखनाद से तीनों लोक गूंज उठे। उनकी इस अद्वितीय वीतरागी शक्ति को देखकर स्वयं श्रीकृष्ण भी विस्मय में पड़ गए थे कि कहीं भविष्य में नेमिनाथ जी वैराग्य छोड़कर राज्य पर शासन न करने लगें।
🐘 करुण पुकार और वैराग्य का महा-उदय
नेमि कुमार जी का विवाह जूनागढ़ के राजा उग्रसेन की सुपुत्री, अत्यंत रूपवती राजकुमारी राजुलमती (राजीमती) से तय हुआ था। जब उनकी बारात गाजे-बाजे के साथ जूनागढ़ पहुँची, तो मार्ग में उन्होंने एक बाड़े में बंद डरे हुए और करुण क्रंदन करते निरीह पशुओं को देखा, जिन्हें विवाह के भोज के लिए लाया गया था।
उन मूक पशुओं की पीड़ा देखकर नेमिनाथ जी के हृदय में परम करुणा और वैराग्य का सागर उमड़ पड़ा। उन्होंने विचार किया कि जिस क्षणभंगुर सुख के लिए इतने जीवों की हत्या हो, वह सुख मेरे किस काम का? उन्होंने तत्काल अपने सारथी को रथ मोड़ने का आदेश दिया और घोषणा की कि वे विवाह नहीं करेंगे। उन्होंने संसार के नश्वर सुखों को त्याग कर आत्मकल्याण और विश्व-कल्याण के पथ पर चलने का संकल्प लिया।
उसी क्षण वे गिरनार पर्वत की ओर मुड़ गए, जहाँ उन्होंने समस्त सिद्धों, मनुष्यों और इंद्रों की साक्षी में पंचमुष्टि केशलोच कर ‘निर्ग्रंथ दिगम्बर दीक्षा’ धारण की और अपनी आत्मा की परम यात्रा प्रारंभ की।
🕉️ केवल्य ज्ञान और समवशरण की अलौकिक रचना
गिरनार के सघन वनों में कठोर तपस्या करते हुए, सिद्धों के आठ गुणों का ध्यान कर और दशलक्षण धर्म को आत्मसात कर, नेमिनाथ जी ने अपने मोहनीय आदि घाती कर्मों का नाश किया और उसी पावन पर्वत पर ‘केवलज्ञान’ (Omniscience) प्राप्त किया।
उनके ज्ञान-कल्याणक के अवसर पर तीनों लोकों के समस्त इंद्रों और देवों ने आकर उनकी स्तुति की और एक अत्यंत भव्य ‘दिव्य समवशरण’ की रचना की। इसी समवशरण से भगवान नेमिनाथ ने संसार के असंख्य जीवों को शाश्वत अहिंसामयी, अनेकांतवादी और वीतराग धर्म का उपदेश देकर मोक्षमार्ग का दर्शन कराया।
⛰️ उर्जयन्त गिरि (गिरनार की पंचम टोंक) – मोक्ष कल्याणक भूमि
गिरनार पर्वत की पाँचवीं टोंक, जिसे जैन शास्त्रों में ‘उर्जयन्त गिरि’ कहा गया है, वही पवित्र और ऊर्जावान स्थान है जहाँ भगवान नेमिनाथ जी ने आषाढ़ शुक्ल सप्तमी के दिन अपने शेष अघाती कर्मों का पूर्ण क्षय कर निर्वाण (मोक्ष) प्राप्त किया।
यहीं से वे जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर लोक के सर्वोच्च शिखर (सिद्धशिला) पर अनंत काल के लिए सिद्ध परमात्मा के रूप में विराजमान हो गए। आज भी वह पंचम टोंक भगवान के पावन चरण-चिह्नों और उस परम आत्मिक शांति की ऊर्जा से ओतप्रोत है।
📚 अकाट्य शास्त्रीय साक्ष्य (Scriptural Evidence)
भगवान नेमिनाथ का संपूर्ण जीवन और गिरनार से उनका संबंध केवल जैन मान्यता नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक सत्य है, जिसके प्रमाण अनेक प्राचीन ग्रंथों में मौजूद हैं:
जैन ग्रंथ जैसे हरिवंश पुराण, महापुराण और पांडव पुराण में इस तीर्थ का विस्तृत वर्णन है।
अनेक इतिहासकारों और वैदिक विद्वानों के अनुसार, यजुर्वेद जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी नेमिनाथ जी के अस्तित्व के सूत्र मिलते हैं।
अन्य प्रामाणिक ग्रंथ एवं शोध पुस्तकें:
विविध तीर्थ कल्प – आचार्य जिनप्रभसूरी (13वीं शताब्दी)
गिरनार गौरव – डॉ. कामता प्रसाद जैन (बंडी धर्मशाला, जूनागढ़)
गिरनार वंदन – डॉ. रमेश चंद जैन (श्री दिगम्बर जैन तीर्थ क्षेत्र कमेटी, मुंबई)
Girnar Evidence – Dr. Bimal Jain (Pub: Mahasabha, New Delhi)
गिरनार महात्म्य – डॉ. जयकुमार जैन
गिरनार: सत्य और तथ्य – डॉ. प्रभाकिरण जैन
इन सभी ग्रंथों में स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध हैं कि गिरनार पर्वत के पाँचों शिखर प्राचीन काल से ही जैन धर्म और भगवान नेमिनाथ से संबंधित रहे हैं।
🪔 पुरातात्विक एवं सांस्कृतिक प्रमाण (Archaeological Proofs)
मथुरा: यहाँ प्राप्त प्राचीन मूर्तियाँ श्रीकृष्ण और बलराम के साथ नेमिनाथ जी की प्रभुता को स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं।
देवगढ़ (ललितपुर, उ.प्र.): यहाँ भी इस कालखंड की ऐतिहासिक मूर्तियाँ सुरक्षित हैं।
तिरुमलै (तमिलनाडु): यहाँ के जैन मंदिर में 8वीं–9वीं शताब्दी की 52 फीट ऊँची श्री नेमिनाथ जी की अत्यंत मनोहारी प्रतिमा विद्यमान है।
जूनागढ़ और गिरनार: जूनागढ़ के किले और गिरनार की पर्वतश्रृंखला में जैन धर्म को समर्पित अनेक संरचनाएँ, गुफाएँ, नक्काशी और प्राचीन पदचिह्न उकेरे गए हैं। यहाँ की मूर्तियाँ और शिलालेख 2000 वर्ष से भी अधिक प्राचीन माने जाते हैं।
जेम्स बर्गेस का विवरण (1874): विश्व जैन संगठन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों के अनुसार, प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता जेम्स बर्गेस ने 1874 में अपनी आँखों से पंचम टोंक का वर्णन किया था। उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि वहाँ एक छोटा खुला मंदिर है, जिसमें नेमिनाथ जी के चरण-चिह्न हैं, और जिसकी देखरेख एक दिगंबर जैन साधु करते हैं।
🔱 धार्मिक अधिकार और वर्तमान समसामयिक परिस्थितियाँ
गिरनार पर्वत अति प्राचीन काल से जैनों का एक पवित्र तीर्थ रहा है। आज भी भगवान के अनुयायी पंचम टोंक पर ‘निर्वाण लाडू’ चढ़ाकर अपनी भक्ति और कृतज्ञता प्रकट करते हैं।
किन्तु, अत्यंत खेद का विषय है कि पिछले कुछ दशकों से इस पावन तीर्थ को एक सुनियोजित तरीके से ‘विवादास्पद’ बनाया जा रहा है। जैन श्रद्धालुओं को वहाँ अपने शांतिपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान करने से रोका जा रहा है। यहाँ तक कि अत्यंत वीतरागी और निर्दोष निर्ग्रंथ दिगम्बर साधुओं पर भी जानलेवा हमले किए गए हैं, जो भारत के लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों पर सीधा प्रहार है।
अन्याय के विरुद्ध अहिंसक शंखनाद: इस अन्याय के प्रतिकार स्वरूप, विश्व जैन संगठन के अध्यक्ष श्री संजय जैन जी के नेतृत्व में एक ऐतिहासिक 101 दिवसीय, 2000 किलोमीटर लंबी ‘धर्मपद यात्रा’ का आयोजन किया। यह यात्रा जैन समाज के अधिकारों और जागरूकता का प्रतीक रही, जिसका लक्ष्य गिरनार की पांचवीं टोंक पर ‘निर्वाण लाडू’ चढ़ाकर अपने शाश्वत अधिकारों की पुनर्स्थापना करना है। यह प्रयास न केवल अद्वितीय है, बल्कि संपूर्ण समाज के लिए प्रशंसनीय और अनुकरणीय है।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि गुजरात उच्च न्यायालय के 17 फरवरी 2005 के अंतरिम आदेश के अनुसार, सभी श्रद्धालु उस स्थल पर अपनी मान्यताओं के अनुसार शांतिपूर्वक पूजन कर सकते हैं। इसके बावजूद जैनों को उनके संवैधानिक और धार्मिक अधिकारों से वंचित किया जाना केवल एक समुदाय के साथ अन्याय नहीं है, बल्कि यह भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत पर एक गंभीर आघात है।
🌿 सर्वोदय संदेश
आइए, हम सभी एकजुट होकर अपनी इस ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा के लिए जागरूकता फैलाएं। गिरनार के पत्थर, वहाँ के शिलालेख और इतिहास के पन्ने आज भी यह गवाही दे रहे हैं कि यह भूमि भगवान नेमिनाथ की है।
भगवान नेमिनाथ की कालजयी शिक्षाएँ—अहिंसा, सत्य, और वैराग्य—आज भी दुनिया भर के आध्यात्मिक साधकों को यह प्रेरणा देती हैं कि असली विजय दूसरों को दबाने में नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर बैठे विकारों को जीतने में है।
— सुदीप कुमार जैन