भारतीय उपउपमहाद्वीप के आध्यात्मिक मानचित्र पर एक ऐसा पर्वत विद्यमान है, जो न केवल अपनी ऊँचाई बल्कि अपनी प्रागैतिहासिक प्राचीनता के कारण अद्वितीय है। जूनागढ़, गुजरात में स्थित गिरनार पर्वत, जिसे प्राचीन ग्रंथों में ‘उर्जयंत’ या ‘रैवतक’ कहा गया है, भौगोलिक रूप से हिमालय से भी पुराना है। जैन ब्रह्मांड विज्ञान (Cosmology) के अनुसार, यह पर्वत वर्तमान ‘अवसर्पिणी काल’ (समय का उतरता चक्र) के 22वें तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ की निर्वाण भूमि है।
लेकिन क्या गिरनार का महत्व केवल आस्था तक सीमित है? ऐतिहासिक शोध और पुरातात्विक साक्ष्य एक अलग ही कहानी बयां करते हैं। आइए, गिरनार और भगवान नेमिनाथ से जुड़े उन रहस्यों की पड़ताल करते हैं जो भारतीय इतिहास की गहराई को फिर से परिभाषित करने की क्षमता रखते हैं।
रहस्य 1: कृष्ण के गुरु ‘घोर अंगिरस’ और वेदों में अरिष्टनेमि
इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के लिए सबसे चौंकाने वाला तथ्य ‘छांदोग्य उपनिषद’ में मिलता है। इस ग्रंथ में भगवान कृष्ण के गुरु के रूप में ‘घोर अंगिरस’ का उल्लेख है, जिन्होंने उन्हें अहिंसा और तप की शिक्षा दी थी। आधुनिक भारतविद और हर्मन जैकोबी जैसे विद्वान यह मानते हैं कि ‘घोर अंगिरस’ कोई और नहीं, बल्कि तीर्थंकर नेमिनाथ ही थे।
- यजुर्वेद का साक्ष्य: भारत के पूर्व राष्ट्रपति और दार्शनिक डॉ. एस. राधाकृष्णन ने रेखांकित किया है कि यजुर्वेद में स्पष्ट रूप से तीन तीर्थंकरों—ऋषभदेव, अजितनाथ और अरिष्टनेमि (नेमिनाथ)—का वंदन किया गया है।
- वैदिक मंत्र: आज भी हिंदू धर्म के मांगलिक कार्यों में ‘स्वस्ति वाचन’ के दौरान यह मंत्र पढ़ा जाता है: “स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः”, जो इस महापुरुष की ऐतिहासिक स्वीकार्यता का प्रमाण है।
- यदुवंश का गौरव: जैन पुराणों (जैसे हरिवंश पुराण) के अनुसार, नेमिनाथ द्वारका के राजा समुद्रविजय के पुत्र और भगवान कृष्ण के चचेरे भाई थे। उनकी ऐतिहासिकता वैदिक और श्रमण दोनों परंपराओं को आपस में जोड़ती है।
रहस्य 2: वह शादी जिसने ‘गिरनार’ को एक वैश्विक तीर्थ बना दिया
इतिहास की दिशा अक्सर युद्धों से बदलती है, लेकिन भारत का नैतिक इतिहास एक ‘त्याग’ से बदला। राजकुमार नेमिनाथ का विवाह जूनागढ़ के राजा उग्रसेन की पुत्री राजुलमती से तय हुआ था। जब विवाह की बारात आगे बढ़ रही थी, तब नेमिनाथ ने बाड़े में बंद हज़ारों बेजुबान जानवरों की चित्कार सुनी, जिन्हें बारातियों के शाही भोज के लिए काटा जाना था।
“यदि व्यक्तिगत सुख की नींव निर्दोषों के रक्त और करुणा के विनाश पर टिकी है, तो ऐसा सुख आत्मिक पतन का मार्ग है। जीव मात्र के प्रति संवेदना ही धर्म का वास्तविक स्वरूप है।”
इसी क्षण राजकुमार ने रथ को गिरनार की चोटियों की ओर मोड़ दिया और दिगंबर दीक्षा धारण कर ली। इसी घटना ने भारत में गिरनार को तीर्थ और ‘अहिंसा परमो धर्म’ के वैश्विक दर्शन की मजबूती से स्थापित किया।
रहस्य 3: हिमालय से भी प्राचीन आध्यात्मिक शक्ति केंद्र
गिरनार (उर्जयंत) पर्वत का आध्यात्मिक भूगोल बेजोड़ है। जैन धर्म में इसे एक ‘सिद्ध क्षेत्र’ माना जाता है। भगवान नेमिनाथ के जीवन के पाँच कल्याणकों में से तीन—दीक्षा, केवलज्ञान, और मोक्ष—इसी पर्वत पर घटित हुए।
यहाँ की पाँच प्रमुख चोटियाँ (Tonks) जैन मुनियों की कठोर तपस्या की साक्षी हैं:
शिखर (Tonk) | जैन मान्यता और ऐतिहासिक साक्ष्य |
प्रथम शिखर | भगवान नेमिनाथ का मुख्य मंदिर, राजुलमती की गुफा और आचार्य कुंदकुंद के चरण चिह्न। यहाँ विक्रम संवत 1249 के शिलालेख मिलते हैं। |
द्वितीय शिखर | यदुवंशी मुनि अनिरुद्ध कुमार की निर्वाण भूमि और माता अंबिका (नेमिनाथ की यक्षिणी) का स्थान। |
तृतीय शिखर | मुनि शंभु कुमार की मोक्ष स्थली, जिन्होंने यहाँ कठोर तप कर कर्मों का क्षय किया। |
चतुर्थ शिखर | भगवान कृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न कुमार की निर्वाण भूमि। |
पंचम शिखर | सर्वोच्च शिखर (उर्जयंत): यहीं भगवान नेमिनाथ ने दीक्षा, केवलज्ञान और निर्वाण प्राप्त किया। यह इस पर्वत का ऊर्जा केंद्र है। |
रहस्य 4: 72 करोड़ मुनियों का ‘आध्यात्मिक विश्वविद्यालय’
गिरनार केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि प्राचीन काल का सबसे बड़ा ‘आध्यात्मिक विश्वविद्यालय’ था। ‘सिरी भूवलय’ और ‘निर्वाण कांड’ जैसे प्राचीन प्राकृत ग्रंथों के अनुसार, यहाँ से कुल 72 करोड़ 700 मुनियों ने मोक्ष प्राप्त किया।
इस संबंध में एक प्राचीन प्राकृत गाथा अत्यंत प्रसिद्ध है: “नेमिसामी पज्जुन्ने संबुकुमार तहेव अनिरुद्धो, बहत्तर कोडिओ उज्जंते सत्तसय सिद्धा।”
यह तथ्य दर्शाता है कि ईसा पूर्व की शताब्दियों में गिरनार एक विशाल संस्थागत आध्यात्मिक अभयारण्य (Institutionalized Sanctuary) था, जहाँ हज़ारों की संख्या में साधु-साध्वी गहन ध्यान और शोध में लीन रहते थे। कल्पसूत्र के अनुसार, नेमिनाथ के संघ में 18,000 साधु और 44,000 साध्वियाँ शामिल थीं।
रहस्य 5: “गुरु दत्तात्रेय” या “गुरु दत्त”? ऐतिहासिक नाम का सच
आज गिरनार के पाँचवें शिखर को लेकर जो विवाद है, उसका मूल ‘भाषाई हेरफेर’ (Phonetic Manipulation) में छिपा है। ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, भगवान नेमिनाथ के 11 गणधरों (प्रमुख शिष्यों) में सबसे प्रमुख वरदत्त थे, जिन्हें ‘दत्त’ या ‘धत्तरी’ (Dhatarie) भी कहा जाता था।
- ऐतिहासिक साक्ष्य: 19वीं सदी के प्रसिद्ध ब्रिटिश पुरातत्वविद् जेम्स बर्गेस (1874-75) ने अपनी आधिकारिक रिपोर्ट “Report on the Antiquities of Kathiawad and Kachh” में स्पष्ट लिखा है कि पाँचवें शिखर पर भगवान नेमिनाथ के चरण चिह्न (पादुका) हैं और वहाँ एक ‘दिगंबर (नग्न) जैन साधु’ उनकी सेवा कर रहा था।
- नाम का परिवर्तन: मूलतः इस शिखर को ‘गुरु धत्तरी शिखर’ (गुरु के शिष्य दत्त का शिखर) कहा जाता था। बाद में, ‘दत्त’ शब्द की ध्वन्यात्मक समानता का लाभ उठाकर इसे ‘दत्तात्रेय’ के साथ जोड़ दिया गया।
- जालसाजी का पर्दाफाश: जेम्स बर्गेस और जेम्स फर्गुसन जैसे विद्वानों ने चेतावनी दी थी कि स्कंद पुराण के ‘गिरनार माहात्म्य’ जैसे बाद के अंशों को स्थानीय स्तर पर गढ़ा गया ताकि इस प्राचीन श्रमण स्थल पर कब्ज़ा किया जा सके।
रहस्य 6: लुप्त होते ज्ञान का संरक्षक – ‘चंद्र गुफा’ का चमत्कार
जैन धर्म के सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक ज्ञान, ‘षट्खंडागम’ की रचना गिरनार की गोद में ही हुई थी। ईसा की पहली शताब्दी में, जब जैन आगमों का मौखिक ज्ञान लुप्त हो रहा था, तब आचार्य धरसेन गिरनार की ‘चंद्र गुफा’ में साधना कर रहे थे।
उन्होंने दक्षिण भारत से आए मुनियों (पुष्पदंत और भूतबली) को ‘व्याख्याप्रज्ञप्ति’ और ‘दृष्टिवाद’ (12वें अंग) का शेष ज्ञान दिया। यदि गिरनार की ये गुफाएँ और आचार्य धरसेन न होते, तो दिगंबर जैन परंपरा का सबसे आधारभूत ज्ञान हमेशा के लिए लुप्त हो गया होता।
निष्कर्ष: एक कालातीत विरासत की रक्षा
गिरनार और भगवान नेमिनाथ का इतिहास साक्ष्यों, शिलालेखों और पुरातात्विक रिपोर्टों की कसौटी पर पत्थर की लकीर की तरह स्पष्ट है। कर्नल टॉड से लेकर जेम्स बर्गेस तक, हर निष्पक्ष पर्यवेक्षक ने इसे जैन श्रमण परंपरा का सर्वोच्च केंद्र माना है।
आज जब हम इस पवित्र पर्वत की ओर देखते हैं, तो इतिहास हमसे एक गंभीर प्रश्न पूछता है: “क्या हम अपनी प्राचीन धरोहरों की सत्यता को बचाने और उन्हें उनके मूल ऐतिहासिक स्वरूप में स्वीकार करने का साहस रखते हैं?” गिरनार केवल एक पहाड़ नहीं, बल्कि भारत की अहिंसक और वैज्ञानिक चेतना का जीवित दस्तावेज है। इसकी पवित्रता और ऐतिहासिक अखंडता की रक्षा करना हमारा सामूहिक कर्तव्य है।
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